अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य
ब्रह्मा वेद पढ़ न तब लाग। पढ़ त वेद तब भा अनुरागा।। कहे वेद पुरुष इक आही। है निराकार रूप न ताही।। शून्य माहिं वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि नहिं आवे।। स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भी मतवाला।। चतुरानन कहे विष्णु बुझावा। आहि पुरुष मोहिं वेद लखावा।। पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहईष वेद मंथन पुरुष इक अहई।। अहै पुरुष इक वेद बतावा। वेद कहे हम भेद न पावा।।
अब ब्रह्मा वेद पढ़ने लगा। वेद में उसने जाना कि एक पुरुष है, जो निराकार है, जिसका कोई रूप नहीं है, जो शून्य में जोत दिखाता है और पाताल तक उसके पाँव हैं। (वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की थी, परम पुरुष का भेद नहीं दिया) यह पढ़ ब्रह्मा मतवाला होकर विष्णु के पास आया और उसे कहा कि मुझे वेद कह रहा है कि एक पुरुष है।
तब ब्रह्मा शिवजी के पास आया और उसे भी यह बात बतायी। ब्रह्मा ने कहा कि वेद का मंथन करने से पता चलता है कि एक पुरुष है, पर वेद कह रहा है कि मैं उसका भेद नहीं जान पा रहा हूँ।
तब ब्रह्मा माता पहँ आवा। करि प्रणाम तब टे के पाँवा।। हे माता मोहि वेद लखावा। सिरजनहार और बतलावा।।
तब ब्रह्मा माता के पास आया और प्रणाम करके कहा कि वेद कह रहा है कि सृष्टि की रचना करने वाला कोई और (निराकार) है।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे जननी सुनो, कहहु कहा कंत तुम्हार है। कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है।।
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