भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

कथा पुराण औरहिं समुझैहैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥ उनसे और सुनै जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहौं परमाना ॥ और देव को अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥ देवन पूजा बहु विधि लैहै । दछिना कारण गला कटैहैं ॥ जा कह शिष्य करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥ परमारथ के निकट न जैहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं ॥ आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दूढै हैं ॥ आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथ के निकट न जायी ॥ आप ऊँच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होई खोटा ॥

जब लग अस कीन्ह प्रहारा ।

ब्रह्मा मूर्छित मही कर धारा ॥

माता के बचन सुन ब्रह्मा मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े ।

गायत्री जान्यो तिहि वारा । हुइ हैं तोर पंच भरतारा ॥ गायत्री तोर होई वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥ धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम बचन सुनायी ॥ निज स्वारथ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥ मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितवत कीन्ही ॥

आद्या शक्ति ने तब गायत्री को भी शाप दिया, कहा-गाय हो जा ! तेरे अनेक पति होंगे । जिस मुख से झूठ बोला, उसी मुख से अब विष्ठा भी खाना । अब अद्या शक्ति ने सावित्री की ओर देखा ।

पुहु पावती निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नशायेहु ॥ सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विश्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥ होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥ जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंश की हानी ॥