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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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अब तुम जाय धरो औतारा । क्योड़ ! कैतकी नाम तुम्हारा ॥

आद्या शक्ति ने पुहुपावती को भी शाप दिया, कहा—तुमने झूठ बोला कि फूल से उत्पन्न हुई, जा केली का फूल हो जा। तू कुण्ठाओं पर उत्पन्न होगी और तुझे लगाने वाले का वंश ही समाप्त हो जायेगा।

भये शापवश तीनों विकल मति हीन छीन कुकर्मते ।

यह काल प्रचण्ड कामिनि डस्यो सब कहँ चर्मते ॥

ब्रह्मादि शिव सनकादि नारद कोठ न बचि भागि हो ।

सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥

शाप पाकर तीनों व्याकुल हो गये और कुकर्म के कारण सबकी मति हीन हो गयी। साहिब धर्मदास से कहते हैं कि काल का यह प्रचण्ड जादू सबपर छाया हुआ है, जिस कारण माया के कामिनि रूप से कोई नहीं बच पाया, सबको इसने डस लिया है। कहाँ तक बात की जाए, ब्रह्मादि, शिव, सनकादि, नारद आदि कोई भी इससे बचकर भाग नहीं सका। हे धर्मदास! इससे केवल वे बिरले जन ही बच सकते हैं, जो सद्गुरु से सत्य शब्द पाकर उसमें रमे रहें।

शाप तीनों को दै लियो, मन माहिँ तब पछतावई ।

कस करहि मोहि निरंजना, पल छमा मोहि न आवई ॥

तो जब तीनों को शाप दे दिया तो शक्ति मन ही मन पछताने लगी कि मैंने इन्हें शाप क्यों दिया, छमा क्यों नहीं कर दिया, अब निरंजन पता नहीं क्या करेगा!

निरंजन ने आकाशवाणी की

अकास बानी तब भयी, यहु कहा कीन भवानिया ।

उत्पति कारन तोहि पठायो, कहा चरित यह ठानिया ॥

निरंजन ने आकाशवाणी की, कहा—हे भवानी! यह तुने क्या किया! मैंने तुम्हें सृष्टि का कार्य करने को कहा, लेकिन तूने क्या चरित्र किया!