भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! मैं तुम्हें नारी स्वभाव बताता हूँ। जब पुत्री घर में होती है तो बड़े यत्न से उसे प्रसन्न, संतुष्ट किया जाता है, पर जब वो पति के घर चली जाती है तो उसी में खो जाती है, उसी से प्रेम करने लगती है, तब माता-पिता को भूल जाती है। ऐसे ही अद्या ने भी किया; वो बेगानी हो गयी, इसी कारण उसने विष्णु को भी काल का रूप ही दिखलाया।

काल निरंजन

चकिया सब रागन की रानी ॥

एक पाट धरती चले, एक चले असमानी।

काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की घानी ॥

बड़े २ इस जगमें पिस गये, पिसे गये योगी जिंदा।

छप्पन कोटि यादवा पिस गये, परे काल के फंदा ॥

नौ भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहस अठासी।

कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता भये, गर्भ के वासी ॥

नौऊनाथ चौरासी पिस गये, बूढ़ा सुत अट्टासी।

मौनी औ सन्यासी पिस गये, परे काल की फांसी ॥

जंगम और सेबड़ा पिस गये, रावण कंसा।

कहें कबीर सुनो भाई साधो, बचे विवेकी संता ॥