भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 144 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

अनुरागसागर वाणी

69

को जीवित नहीं छोड़ता है। करोड़ों विष्णु के अवतारों को उसने खा लिया, ब्रह्मा और शिवजी को भी नचा-नचाकर खाया। फिर साधारण जीवों के जीवन का दुख कहाँ तक कहूँ! रोज़ एक लाख जीवों को वो खाता है, ऐसा भयानक कसाई है।

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास कह सुनहु गुसाई। मोरे चित्त संशय अस आई॥ अष्टं गीहि पुरुष उत्पानी। जिहि विधि उपजी सो मैं जानी॥ पुनि वहि ग्रास लीन्ह धर्मराई। पुरुष प्रताप सु बाहर आई॥ सो अष्टं गीहि अस छल कीन्हा। गोइसि पुरुष प्रगट यम कीन्हा॥ पुरुष भेद नहिं सुनत बतावा। काल निरंजन ध्यान करावा॥ यह कस चरित कीन्ह अष्टं गी। तजा पुरुष भइ काल की संगी॥

धर्मदास ने कहा-हे साहिब! मेरे चित्त में एक संशय है कि अद्या को परम पुरुष ने उत्पन्न किया। फिर उस अद्या को काल निरंजन ने खा लिया। फिर परम पुरुष के प्रताप से वो बाहर आई। ऐसी आद्य शक्ति ने परम पुरुष का भेद क्यों नहीं दिया। काल निरंजन का ध्यान क्यों करवाया! उसने यह चरित्र क्यों किया कि परम पुरुष को छोड़ काल के साथ हो गयी!

साहिब कहते हैं

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ। अब तोहि प्रगट वरणि समझाऊँ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं। अनेक यतन परितोष ताहीं॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा। रात्या तासु संग गुण नेहा॥ मात पिता सबै बिसरावा। धर्मदास अस नारि स्वभावा॥ ताते अद्या भई विगानी। काल अंग हैं रही भवानी॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी। काल रूप विष्णुहि दिखलायी॥