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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

धर्मदास का संशय

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास गहि टेके पाया। हे साहिब इक संशय आया।।

कन्या मन को ध्यान बतावा। सो यह सकल जीव भरमावा।।

धर्मदास जी ने साहिब के चरण पकड़ लिये, कहा कि एक संशय है, अद्या ने उस मन का ध्यान करना विष्णु को बता दिया, जिसने सब जीवों को भरमाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

धर्मदास यह काल स्वभाऊ। पुरुष भेद विष्णु नहिं पाऊ।।

कामिनी की यह देखहु बाजी। अमृत गोय दियो विष साजी।।

देख ज्योति पतंग हु लासा। प्रीति जान आवै तिहि पास।।

परसत होवे भस्म पतंगा। अनजाने जरि मरे पतंगा।।

ज्योति स्वरूप काल असस आही। कठिन काल वह छाड़त नाहीं।।

काहि विष्णु औतारहि खाया। ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया।।

कौन विपति जीवन की कहऊं। परखि वचन निज सहजहि रहऊं।।

लख जीव वह नित्यहि खाई। अस विकराल सो काल कसाई।।

साहिब ने कहा—हे धर्मदास! यह काल का स्वभाव था, परम पुरुष का भेद विष्णु ने नहीं पाया। अद्या का खेल तो देखो, उसने काल रूपी, मन रूपी विष का भेद विष्णु को देकर परम पुरुष रूपी अमृत का भेद गुप्त रखा। जैसे दीपक की लौ को देखकर पतंगा प्रसन्न होता है और प्रेम वश उसके पास आता है, पर उसके स्पर्श से वो पतंगा भस्म हो जाता है, अनजाने में बेचारा जल मरता है। ऐसे ही ज्योति स्वरूप काल भी किसी