भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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विष्णु को हुए पिता के दर्शन

अब माता विष्णु पहुँ आई। लीन्ह विष्णु कहँ गोद उठाई॥ पुनि अस कहै उ आदि भवानी। अब सुनहु पुत्र मम बानी॥ देख पुत्र तोहिँ पिता भिटावों। तोरे मन कर धोख मिटावों॥ प्रथमहिँ ज्ञान दृष्टि सों देखो। मोर बचन निज हृदय परे खो॥ मन स्वरूप करता कहँ जानो। मनते दूजा और न मानो॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा। मन अस्थिर मन अहै अनेरा॥ क्षणमहँ कला अनंत दिखावे। मनकहँ देख कोइ नहिँ पावे॥ निराकार मनही को कहिये। मन की आश निशि दिन रहिये॥ देखहु पलटि शून्य महँ जोती। जहवाँ झिलमिल झालर होती॥ फेरहु श्वास गगन कहँ धाओ। मार्ग अकाशहि ध्यान लगाओ॥ जैसे माता कहि समुझावा। तैसे विष्णु ध्यान मन लावा॥

विष्णु ने सत्य बोला था, इसलिए माता ने विष्णु को गोद में बिठाकर कहा कि हे पुत्र! तुझे पिता का दर्शन करवाती हूँ। मन ही सृष्टि का कर्ता है, मन से ही स्वर्ग, पाताल आदि हैं। मन को कोई देख नहीं पाता है, यही निराकार तुम्हारा पिता है। फिर शून्य में माता ने विष्णु को ज्योति के दर्शन कराए और कहा कि श्वास को पलट कर ऊपर शून्य में चढ़ाओ, ध्यान लगाओ। विष्णु ने वैसा ही किया।

तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आप दिखायऊ।

कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हर्षित भये॥

मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णु भा।

मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव॥

तब मन विष्णु को दिखाई दिया, निरंजन(मन) ने ज्योति दिखाई और उसे देख विष्णु बड़े प्रसन्न हुए, माता को शीश नवाया, कहा—मैंने तुम्हारी कृपा से परमात्मा के दर्शन कर लिये।

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