भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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चौरासी लाख योनियाँ बनीं

यह सब द्वंद बाद है गयऊ। तब पुनि जग की रचना भयऊ॥ चौरासी लख योनिन भाऊ। चार खानि चारहु निर्माऊ॥

जब यह झगड़ा समाप्त हो गया तो फिर जगत की रचना की गयी, चौरासी लाख योनियाँ और चार खानि बनाई गयीं।

प्रथम अंडज रच्यो जननी, चतुरमुख पिंडज कियो॥

विष्णु उष्मज रच्यो तबही, रुद्र अस्थावर लियो॥

लीन्ह रचि जेहि खानि चारो, जीव बंधन दीन्ह हो॥

माता ने अंडज खानि की उत्पत्ति की, ब्रह्मा ने पिंडज खानि की उत्पत्ति की, विष्णु ने उकमज खानि के जीवों को रचा और शिवजी ने अस्थावर जीवों की रचना की। इस तरह चार खानि की रचना करके जीवों को बाँध दिया।

नौ लख जल के जीव बखानी। चौदह लाख पक्षी परवानी॥

किरम कीट सत्ताइस लाख। तीस लाख पिंडज भाखा॥

चतुर लक्ष मानुष परमाना। मानुष देह परम पद जाना॥

और योनि परिचय नहीं पावे। कर्म बंध भव भटका खावे॥

नौ लाख जल के जीव(अस्थावर)हैं, 14 लाख अंडज हैं, 27 लाख उकमज खानि के जीव(कीट-पतंगे)हैं, 30 लाख पिंडज खानि हैं और चार लाख मानुष योनि हैं। इनमें मनुष्य ही परम पद(मोक्ष) की प्राप्ति कर सकते हैं, बाकी नहीं।

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