अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवों को कष्ट दिये निरंजन ने
यम बाजी कोई चीन्ह न पाया। आशा दे यम जीव नचाया ॥ लख जीव नित प्रति खाई। महा अपरबल काल कसाई ॥ तप्त शिला निशि दिन तहँ जरइ। तापर लै जीवन कहँ धरई ॥ जीवहि जारे कष्ट दिलावे। तब फिर लै चौरासी नावे ॥
साहिब कह रहे हैं कि काल का खेल कोई नहीं समझ पाया, यह ऐसा भयानक कसाई है कि लाख जीवों को प्रतिदिन तप्त शिला पर भून-भून कर खाता है। जीवों को जलाकर कष्ट देकर फिर चौरासी की खानि में फेंक देता है।
जीव कीन्ह तब बहुत पुकारा। काल कष्ट देत अपारा ॥
यमकर कष्ट सह्यो न जाई। है कोई रक्षक करो सहाई ॥
ऐसे मैं जब काल जीवों को बहुत कष्ट दे रहा था तो जीवों ने पुकार की कि काल हमें बड़ा कष्ट दे रहा है, जो हमसे सहा नहीं जा रहा। यदि कोई रक्षक है तो हमें बचाओ!
चकिया सब रागन की रानी ॥ एक पट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की धानी ॥
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