भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अमर लोक से साहिब चले

देख जीवन विकल अति, दया पुरुष जनाइया। दयानिधि सत पुरुष साहिब, तबहिं मोहिं बुलाइया ॥ कहे मुहिं समुझाय बहु विधि, जीव जाय चितावहू। तुम दरश ते हो जीव शीतल, जाय तपन बुझावहू ॥

जीवों की पुकार जब परम पुरुष के पास पहुँची तो वे दयाल हुए, कबीर साहिब कह रहे हैं कि तब उन्होंने मुझे बुलाया और समझाकर कहा कि जीवों को चिताकर ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हँस को काज। जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुरुष को लाज ॥

परम पुरुष को प्रणाम कर जीवों के काम के लिए साहिब चल पड़े।

नो भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहज अठासी। कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता, भये गर्भ के वासी ॥

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