भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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निरंजन ने साहिब से बहस की

जबहिं पुरुष आज्ञा कीन्हा। जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई। तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥ मो कहँ देखि धर्म ढिग आवा। महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहँवा कस आवो। सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥

जब साहिब आए तो रास्ते में निरंजन मिला, उसने क्रोधित होकर पूछा कि यहाँ क्यों आए हो!

निरंजन ने कहा

जाहु ज्ञानी घर आपने, मानो वचन हमार। तीन लोक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

निरंजन ने कहा—हे ज्ञानी! वापिस अपने घर जाओ, यह संसार मेरा है, परम-पुरुष ने दिया है।

साहिब ने कहा

मुहि जो पठयो पुरुष को, करन हंस के काज। कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

साहिब ने कहा कि मुझे परम पुरुष ने जीवों के कल्याण के लिए भेजा है, तुझे मारने का सामान भी उन्होंने मुझे दिया है।

तासों कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥ तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि बारि निज स्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कहँ दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ ॥ ताते हम संसारहि जायब। दे परवाना लोक पठायब ॥

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