अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरंजन अधीन हुआ
भया अधीन दोई कर जोरी। तुम सतपुरुष सरन हम तोरी।। प्रथम ज्ञानी हम नहीं जाना। बन्धु जान कीन्हा अभिमाना।। तुमसो बल बुद्धि हम धारा। अब तुम करहु मोर उद्धार।। मैं साहिब तुमको नहीं चीन्हा। सतपुरुष तुम दरसन दीन्हा।। दोइ कर जोरि चरण चित लावा। धन्य भाग हम दरसन पावा।।
तब निरंजन अधीन हुआ और दोनों हाथ जोड़कर कहा कि मैं आपकी शरण में हूँ, आप तो स्वयं सत्पुरुष हैं, मैंने भाई जानकर आपसे युद्ध किया, आपको पहचाना नहीं, आपसे ही बल और बुद्धि का प्रयोग किया, इसलिए क्षमा करें। मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने आज मुझे दर्शन दिये।
साहिब ने कहा
सुन रे काल निरंजन राई। पुरुष नाम जो बीरा पाई।। ताको खूँट गहो मत लाई। सो हँसा मेरे लोकहि आई।।
साहिब ने कहा कि हे निरंजन! जिसे नाम मिल जाएगा, उसे तुम नहीं पकड़ोगे, वो मेरे देश में आएगा।
निरंजन ने कहा
सुनो गुसाई विनती मोरी। नाम पाय करै कछु औरी।। ज्ञान कथै अनत चित वासा। आवागमन की राखै आसा।।
निरंजन ने कहा कि जो नाम पाकर गलत चलें, नियमों का पालन न करें, आवागमन की इच्छा रखें, उनका क्या होगा, क्या वे भी पार होंगे!
साहिब ने कहा
सुनो निरंजन बचन हमारा। नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा।।
तब साहिब ने वहाँ निरंजन से करार किया कि नहीं, उसे तुम ले जाना, वो जीव तुम्हारा हो जाएगा।
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