अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा
और असली रूप में आए साहिब
यह सुन काल भयंकर भयऊ। हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्ही। राज बड़ाई पुरुष मुहिं दीन्ही॥ फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ। अष्टं गी पुरुष हम दयऊ॥ तब तुम मारि निकारे मोहि। योगजीत नहिं छाड़ों तोहिं॥ अब हम जान भली विधि पावा। मारों तोहि लेउँ अब दावा॥ गरजे काल महा बिकराला। सत्रह लाख लो पाँव पसारा॥ लपकै जीभ जिमि टूटे तारा। जिमि बिजली चमकै औंधियारा॥ सूढ़ बढा य दंत अति बाढ़। मध्य घेर ज्ञानी कहैं ठाढ़॥ हमरे पौरुष हम बरियारा। तुम ज्ञानी का करो हमारा॥
यह सुन निरंजन क्रोधित हो गया, साहिब को भय दिखाने लगा, कहा कि परम पुरुष की सेवा करके मैंने तीन लोक का राज्य और अष्टंगी को प्राप्त किया, पर तब तुमने मुझे मानसरोवर से निकाल दिया, इसलिए अब मैं तुमसे बदला लूँगा, तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। निरंजन ने तब विकराल हाथी का रूप धारण किया और सूँढ़ और दाँत बढ़ाकर साहिब को बीच में घेर लिया, कहा- हम बड़े बलवान हैं, तुम हमारा क्या करोगे!
ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँढ़ दाँत गहि मोरा॥ मारे उ सब्द पाँव कर पेली। तोर सूँढ़ समुद्र गहि मेली॥ पुरुष रूप तबहीं पुन धारा। जौन सूरूप सकल औतारा॥
साहिब ने कहा कि तब वहाँ मैंने परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया, उसपर सुरति फेंकी, उसके दाँत तोड़ दिये और उसकी सूँढ़ पकड़ उसे समुद्र में फेंक दिया।