अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ें96
साहिब बन्दगी
निरंजन ने कहा
निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥ करम जंजीर बँधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥ तीन लोक जोइन औतारा । आवागमन में फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बड़े जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥ करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
निरंजन ने बड़े घमण्ड से कहा कि मेरे फंद को तोड़कर कौन जा सका है, मैंने कर्म की जंजीर से सारे संसार को बाँधा हुआ है, क्या ऋषि, क्या मुनि, क्या सिद्ध, क्या साधु, क्या देवता, त्रिदेव आदि सबको कर्म जाल में उलझाकर बार-बार खा जाता हूँ, कोई भी कर्म से न्यारा नहीं है।
साहिब ने कहा
कहै ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहँ टूक जंजीर तुम्हारा ॥ हंसन लैहँ तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीन्हँ मोहि भारी ॥
साहिब ने कहा-हे झूठे ! तेरी कर्म की जंजीर को भी तोड़ दूँगा, परम पुरुष ने मुझे ऐसा जबरदस्त नाम दिया है कि कर्म जाल से भी जीव को छुड़ा लेगा।
❀ ❀ ❀