अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३० 139 विष्णुवाक्योद्भवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥ विश्वकर्मोवाच - अथातोऽनन्तरं तत्र पर्वते गन्धमादने। आगतश्च स्वयं विष्णुर्जगदाह्लादकारकः ॥ १॥ उद्धृत्याम्ब्वर्थपात्रं तु त्वष्ट्राद्यैर्मुनिसत्तमैः। सुरासुरैः समस्तैश्च स्तूयमानं जगत्पतिम् ॥ २॥ स्थित्वासने महोत्सवे सिंहरूपायदलङ्कृते। प्रहृष्टं च जगन्नाथं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ३॥ विश्वकर्मा बोले - इसके बाद, गन्धमादन पर्वत पर जगत को प्रसन्न कर देने वाले भगवान् विष्णु स्वयं पधार गए और त्वष्टादि मुनि सत्तमों ने अपने कमण्डलों को हाथ में उठाकर और सभी सुरों व असुरों ने जगत्पति भगवान् विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान् जगन्नाथ को शङ्ख-चक्र-गदादि धारण किए हुए प्रसन्न मुद्रा में सिंह की आकृतियों से अलङ्कृत सिंहासन पर विराजमान करते हुए बड़ा महोत्सव मनाया। त्वष्टाद्याश्च मुनीन्द्राश्च हरिपाश्र्वे तु संस्थिताः। सिंहासने निविष्टं तमादितेजोभवं प्रभुम् ॥ ४॥ ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ ‘ॐ नमो नारायणाय ।’ ‘ॐ नमः कृष्णाय’ इति मूलमन्त्राः सर्वपापप्रणाशनाः ॥ तानुच्चार्य ॥ इसमें त्वष्टादि समस्त मुनिगण भगवान् विष्णु के पास में खड़े हो गए और उन आदि तेजोभव प्रभु को सिंहासन पर निविष्ट करके, आसीन करके ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, ‘ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ नमः कृष्णाय’ इत्यादि मूल मन्त्रों का उच्चारण आरम्भ किया जो सर्व पापों का नाश करने वाला है। दण्डवत् प्रणतो भूत्वा पृच्छति त्वपराजितः। दशावताराः श्रीविष्णोः कथिता विश्वकर्मणा ॥ ५॥ त्वष्टा चैव कथं देव कथं तस्य समुद्भवः। कस्मिन्कालेवतारश्च कथयस्व जगत्पते ॥ ६॥ इसी बीच विश्वकर्मा ने दशावतार ग्रहण करने वाले भगवान् विष्णु की ओर सम्मुख हुए कहा कि दण्डवत प्रणाम करके अपराजित यह पूछता है कि हे