अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
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140 अपराजितपृच्छा जगतपते ! त्वष्टा$^1$ कौन देवता है और उनका समुद्भव कैसे हुआ तथा उनका अवतार किस समय हुआ, यह कृपा कर कहिए। विष्णुरुवाच — सरस्वत्यर्णवाभ्यां च पुण्यप्रभास आश्रमः। प्रयतात्मा महातीर्थं गत्वा तु हरजन्मदम्॥ ७॥ दृष्ट्वा तु हरते पापं स्नात्वा देवत्वदायकम्। समागतः सोमराजो दृष्ट्वाश्रममथोत्तमम्॥ ८॥ (विश्वकर्मा के प्रश्न पर) भगवान् विष्णु कहने लगे— सरस्वती सागर$^2$ के पास प्रभास आश्रम का पुण्यक्षेत्र है। कोई यदि प्रयत्न करके उस महातीर्थ को जाए तो
- यहाँ त्वष्टा के सम्बन्ध में पूछा तो गया है किन्तु इस सूत्र में वर्णन नहीं है। द्राविड़ वास्तुग्रन्थ 'मानसार' में आया है कि ब्रह्मादि के समान विश्वकर्मा चार मुख वाले हैं। चारों मुखों में से पूर्वमुख विश्वभू कहलाता है। दक्षिणमुख विश्वविद कहलाता है। उत्तरमुख विश्वस्थ कहलाता है जबकि पश्चिम मुख विश्वसृष्टा कहलाता है। इन्हीं चारों मुख से पहले चार विश्वकर्मा हुए। पूर्वी मुख के विश्वकर्मा, दक्षिण से मय, उत्तर से त्वष्टा तथा पश्चिमी मुख से मनु हुए। विश्वकर्मा का विवाह इन्द्र की पुत्री से, मय का विवाह सुरेन्द्र की पुत्री, त्वष्टा का विवाह वैश्रवण की पुत्री और मनु का विवाह नल की पुत्री से हुआ। विश्वकर्मा के पुत्र स्थपति कहलाए। मय के पुत्र सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र वर्धकी और मनु के पुत्र तक्षक कहलाए। ये ही आदि स्थपति है— विश्वकर्मा चतुर्वर्णजाति ब्रह्मादिवर्णवत्। पूर्वोक्तवर्णं चत्वारि नामं वक्ष्ये पृथक् पृथक्॥ विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्। दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे॥ पश्चिमे विश्वस्रष्ट्राख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्। एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्मा चतुष्टयः॥ पूर्वानने विश्वकर्मा जायते दक्षिणे मयः। उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः॥ उपयेमे विश्वकर्मा इन्द्रस्य तनयां तदा। मयः सुरेन्द्रतनयामुपयेमे त्वनन्तरम्॥ त्वष्टा वैश्रवणसुतामुपयेमे त्वनन्तरम्। मनुर्नलस्य तनयामुपयेमे तु तुर्यकम्॥ विश्वकर्माख्यनाम्नोस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते। मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः॥ त्वष्टुर्देव- ऋषिः पुत्रो वर्धकीति प्रकथ्यते। मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादि चतुष्टयमये॥ (मानसार 1, 3-10) मानसार के तहत वास्तुशास्त्र प्रणेताओं में भी त्वष्टा का नामोल्लेख हुआ है— अगस्त्यः काश्यपश्चैव भृगुर्गौतमभार्गवाः॥ गालव इति ऋषयः प्रोक्ताः कर्षणायर्चनार्थकम्। तत्तत्तन्त्रवशात्सर्वं कुर्यात् षट् सम्पादस्पदम्॥ तत्तत्तन्त्रविपरीतं चेद् विपत्यं नित्यमावहेत्। अनुक्तं तत्र तन्त्रैस्तु ग्राह्यं दोषो न विद्यते॥ विश्वकर्मा च विश्वेश्र विश्वसारं प्रबोधकः। वृतश्चैव मयश्चैव त्वष्टा चैव मनुर्नलः॥ मानविन्मानकल्पश्च मानसारो बहुश्रुतः। प्रष्टा च मानबोधश्च विश्वबोधो नायकश्च तथा॥ (तत्रैव 1, 2-6)
- गुजरात में राजा सिद्धराज के समय में सरस्वतीपुराण का प्रणयन माना जाता है। इसमें सरस्वती के क्षेत्र में नाग जाति के बसी होने का विशेष विवरण मिलता है। यथा— एष उखर संगृह्य अन्धकूपान्महामनः। नागलोके स्वयं गत्वा नागान् सञ्जीवयिष्यति॥ (सरस्वती. अध्याय 15) स्कन्दपुराण के नागरखण्ड में चमत्कारपुर के पास सारस्वतह्रद का वर्णन है जहाँ स्नान के लिए आने वाले विप्रों को नागजन त्रास देते रहते थे। (स्कन्द. नागर. 114, 17-18-83) इसी प्रकार प्रभासक्षेत्र माहात्म्य में आया है— सरस्वत्यां ब्रह्मकुण्डेऽसंख्याता मुनयः स्मृताः। दशार्बुदसहस्राणि कोटित्रितयमेव च॥ ऋषयस्तत्र तिष्ठन्ति यत्र प्राची सरस्वती। ब्रह्महत्या गता यत्र शङ्करस्य च तत्क्षणात्॥ कायः सुवर्णतां प्रापं कपालं पतितं करात्। ज्ञात्वैवं