भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र ३० 141

हर, महादेव उसे नया जन्म प्रदान कर देते हैं। उस देवत्वदायक तीर्थ में स्नान करते ही और उसे देखने मात्र से समस्त पाप दूर हो जाते हैं। उस सर्वोत्तम आश्रम के अवलोकन मात्र से सोमराजा तुरन्त प्रकट हो गए। अथाश्रमवर्णनमाह— विविधैर्वनजैः कीर्ण तथा पुष्पैः समाकुलम्। सुरभितामृतोपेतं नानाफलैश्च सङ्कुलम्॥ ९॥ पारिजातप्रभृतिभिः कङ्कोलैश्चैव पादपैः। देवदारुभिराकीर्णं तथा वै रक्तचन्दनैः॥ १०॥ तालतमालाशोकैश्च रम्भाप्रियङ्गुचम्पकैः। पुन्नागनागबकुलैः पाटलैर्बिल्वचन्दनैः॥ ११॥ जातीतगुरुकुमुदानेकपुष्पैः सुपुष्पितम्। विविधैश्च तथा वृक्षैः शोभितं दिव्यमाश्रमम्॥ १२॥ वहाँ विविध प्रकार के वन पुष्पों के समूह थे जिनसे वह स्थान अमृत के समान सुरभित हो रहा था और वहाँ नाना प्रकार के फलों की भरमार थी। पारिजातादि स्वर्ग के वृक्ष और कङ्कोल के पौधे व देवदारु व रक्तचन्दन के पेड़ों से लकदक वह क्षेत्र ताल, तमाल, अशोक, रम्भा, केल, प्रियङ्गु, चम्पक, पुन्नाग, नाग, बकुल, पाटल (गुलाब) और बिल्व व चन्दन, जाती, तगर, कुमुद आदि अनेक प्रकार के पुष्पों से सुपुष्पित विविध वृक्षावलियों से वह दिव्य आश्रम सुशोभित था। विचित्रं हेमरचितं निर्मलं कुमुदेशवत्। विपुलजलं- ? स्फटिकशङ्खवेदी ? ॥ १३॥ तरङ्गभङ्गुरावर्तमुग्रं मीनैरनेकशः। शिशुमारैश्च नक्रैश्चाऽनन्तं दुर्गं शुक्त्यादिभिः॥ १४॥ योजनायुतविस्तीर्णं भीषणीयं ग्रहाकुलैः। भयावहं च गहनं गम्भीरावर्तव्याकुलम्॥ १५॥ इमं समुद्रतीरस्थं माहेन्द्रं विन्ध्यगामिनम्?। रम्याश्रमं प्रभासस्य प्रविष्टस्तारकाधिपः॥ १६॥ इसी प्रकार वहाँ विचित्र रूप से स्वर्ण से बनी हुई, शुद्ध विशाल कमल के


शङ्खिना पूर्वं कृतं तत्र महातपः॥ तुष्टः श्रीशङ्करो देवो लिङ्ग वासवरेण तु। कोटियज्ञफलं स्नाने प्राच्यां लिङ्गस्य पूजन॥ (स्कन्द. प्रभास. 5, 22-25)