भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 535 में से

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142 अपराजितपृच्छा समान अर्थात् कमल दलों में राजा की तरह शोभित, विपुल जलराशि से पूर्व सरोवर में स्फटिक से शङ्ख की रचना जैसी वेदी बनी हुई थी। उस सरोवर में अनेकों मछलियाँ आतुरता से तैरती हुई उग्र तरङ्गों की चक्रियाँ बना रही थीं और उस सरोवर में अनेक शिशुमार (जलमानुष, एक प्रकार का मत्स्य), मगर, और बड़े सीप आदि भी थे। यह सरोवर एक युत (अरब) योजन विस्तार वाला और भीषण, भयङ्कर ग्राहादि जल-जन्तुओं से भरा हुआ, बहुत गहरा और बड़ी-बड़ी विशाल लहरों के भँवरों से उद्वेलित था। इस समुद्र के किनारे विन्ध्याचल पर्वत पर बने सुन्दर आश्रम में तारकाधिप महेन्द्र प्रभास प्रविष्ट हुए। प्रणिपत्य तदा देवं प्रभासं भुक्तिमाप्नुयात्। अस्माकमीश्वरं भक्त्या राधयामि च संयतः ॥ 17 ॥ तदाज्ञया चाश्रमेऽस्मिन् निष्ठाराध्यमहेश्वरम् । तदा लब्ध्वाश्रमं श्रेष्ठं दत्तं प्रभासतुष्टिदम् ॥ 18 ॥ (प्रभास ने) वहाँ प्रणाम किया। इस पर वहां के (महेश्वर) देव ने प्रभास को भुक्ति-मुक्ति प्रदान की। प्रभास ने कहा कि 'आप मेरे ईश्वर हैं और मैं आपकी संयत चित्त से भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ।' 'इस आश्रम में स्थित महेश्वर की निष्ठापूर्वक आराधना करो'— ऐसी आज्ञा के साथ ही यह श्रेष्ठ आश्रम प्रभास को प्रदान किया जिसे पाकर उसे परम शान्ति हुई। मन्वन्तरं शतं सार्धं सोमोऽकार्षीत् तपो नृपः । तोषयित्वा महादेवं प्रत्यक्षं शिवसम्भवम् ॥ 19 ॥ आह्लादितमना भूत्वा दृष्ट्वा च परमेश्वरम् । राजेन्द्र क्षिति कृत्वा तु निश्चलं देवसम्भवम् ? ॥ 20 ॥ इस आश्रम में एक सौ पचास मन्वन्तरों तक सोम राजा ने बड़ा ही कठोर तप किया जिससे उसने महादेव शिव को तप द्वारा सन्तुष्ट करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया। महादेव शिव स्वयं उस राजा के सामने प्रकट हुए। भगवान् महादेव शिव परमेश्वर को देखकर बड़े ही प्रसन्न मन वाला होकर उस राजेन्द्र सोम ने इस पृथ्वी पर भगवान् शिव के प्राकट्य को निश्चल (प्रतिमा रूप में साकार, स्थापित) किया। ईश्वर उवाच — तुष्टो ऽहं तव राजेन्द्र भक्त्या च परया त्वयि । वरं ब्रूहि च दास्यामि यथेच्छं तारकाधिप ॥ 21 ॥