अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३० 143 धर्मार्थकाममोक्षाणां ददामि यत्त्वदीप्सितम्। नासत्यं नान्यथा चैवं त्वद्भक्त्या रोहिणीपते ॥ 22 ॥ (इस पर) ईश्वर बोले— हे तारकाधिप सोमराज! मैं तुम्हारी पराभक्ति से परम तुष्ट हुआ हूँ अतः तुम कोई वर माँगो क्योंकि मैं तुम्हें यथेच्छ वर देना चाहता हूँ। हे रोहिणीपति सोम, चन्द्रराजा तुम्हारी पर भक्ति के फलस्वरूप जिस तुम्हारे चाहे हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाला वर मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह कभी भी असत्य नहीं होगा न ही किसी तरह अन्यथा होगा।¹ चन्द्र उवाच — अस्माकमात्मनः पार्श्वे मानसाङ्गं सुधार्यकम् ? । ममाभिधानतश्चैवाऽवतारस्तव साम्प्रतम् ॥ 23 ॥ (वर माँगते समय) चन्द्र बोले— हे प्रभु! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप मेरे आत्मा के पास मानस अङ्ग धारण करके मेरे गात्र को ही अपना स्थान बनाते हुए तुरन्त अवतरित हों। देव्युवाच — शशाङ्क देवदेवेश तिलकत्ववाप्नुहि। अथातस्त्वं तत्तिलके तथा तिष्ठ मम प्रिय ॥ 24 ॥ (इस बीच पार्वती) देवी बोली— हे शशाङ्क! मैं तुम्हारे मस्तक पर देवदेवेश महादेव शिव का तिलक लगा देती हूँ जिससे ज्योंहि यह तिलक तुम्हारे मस्तक पर लगेगा, त्योंहि मेरे प्रिय स्वामी महादेव शिव तुम्हारे तिलक में स्थित हो जाएँगे। ईश्वर उवाच — त्वयेप्सितं वरं यच्च प्रयच्छामि हितैषिणे। इच्छयात्ममुखनैवाऽसारसंसारमोक्षदम् ॥ 25 ॥ निश्चितात्मसुखैरेवं शान्तावस्था मुखबोधिनी ? । स्वप्रावस्थायां न सौख्यमात्मनो राहिणीपतेः ॥ 26 ॥ स्वप्रावस्थो यदा दृष्टो भस्मोद्धूलिततापसः। स्कन्धारुह्य हतं चौरै ? अस्मत्त्वयि विनिवेदयेत् ? ॥ 27 ॥
- आद्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य ने सोमनाथ की आराधना इस प्रकार की है— सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावंतसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्यते ॥ (द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्र)