अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें144 अपराजितपृच्छा ईश्वर ने कहा कि तुम्हारे माँगे हुए जिस वरदान को मैं हित भावना से दे रहा हूँ, वह इस असार संसार से मुक्ति दिलाने वाला है। मेरे मुख से जो यह ज्ञान तुम्हें मिला है, यह निश्चित ही आत्मसुख एवं शान्तावस्था और हे रोहिणीपति सोम! तुम्हारी आत्मा को भी सुख देने वाला है परन्तु तुम्हारी स्वप्नावस्था में नहीं, जागृत रहने पर ही यह सम्भव है। यदि स्वप्नावस्था में तुम्हें भस्म-धूलि लगाए हुए कोई तपस्वी दिखाई पड़ जाए जो किसी मारे गए चोर को अपने कन्धे पर उठाए हुए हो और अपने बारे में तुम्हें ऐसा कहे कि- तापस उवाच - अहं सोम जगत्कर्ता वैरं स्यात्तु लङ्काधिपे। त्वद्भक्तयाऽऽगतोऽहं वत्स चन्द्रनामाऽवतारतः ॥ २८ ॥ योगावस्थास्थितस्वेवं चिन्तात्मा रोहिणीपते। उदकोल्लङ्घनं कृत्वा ऐन्द्रीं गतो दिशां प्रति ॥ २९ ॥ (उक्त तापस कहे कि) - हे सोम! मैं ही इस जगत का कर्ता भगवान् विष्णु हूँ जिसका लङ्काधिपति रावण से वैर हो गया था वही मैं तुम्हारी भक्ति से हे वत्स! चन्द्र नामावतार से आ गया हूँ। हे रोहिणीपति! इस प्रकार की योग स्थिति में चिन्तात्मा होकर समुद्र को लाङ्घकर मैं, पूर्वदिशा की ओर गया। कैलासाल्लिङ्गमानीय दानवेन्द्रो लङ्काधिपः। आगमिष्यामि ? क्षेत्रैषु तस्य वाचा प्रबलोद्भवम् ? ॥ ३० ॥ ददामि ते त्वहं सोम सोमे वदति दुर्धरः। क्षणार्धं तु धृतं विप्र यदाहं भो क्षितौ ततः ? ॥ ३१ ॥ गृहीत्वा सोमराजेन्द्रो लङ्कावधि वनैः स्थित ?। उक्तं लिङ्गं तु राजेन्द्र क्षितौ भूत्वा तु निश्चलम् ? ॥ ३२ ॥ वह दानवेन्द्र लङ्कापति रावण कैलाश पर्वत से शिवलिङ्ग लाकर समस्त क्षेत्र में उसकी प्रबल वाचा का उद्घोष करेगा कि मैं आ गया हूँ। हे सोम! वही शिवलिङ्ग मैं तुम्हें देता हूँ और वह सोम को बड़े ही भयानक उद्धत ढंग से कहता है कि हे विप्र! थोड़ी देर के लिए इस शिवलिङ्ग को थामे रहो जब तक कि मैं पृथ्वी पर खड़ा रहूँ। उसे ग्रहण करके सोम राजेन्द्र तब तक ठहरा रहा जब तक लङ्काधिपति रावण उस वन में स्थिर रहा और उसके आने की अवधि तक प्रतीक्षारत रहा परन्तु जब रावण बड़ी अवधि तक नहीं आया तो शिवलिङ्ग को सोम राजेन्द्र ने धरती पर रख दिया और निश्चल अर्थात् वहीं पर प्रतिष्ठित कर दिया।