अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३० 145 पूजितं लिङ्गराजेन्द्रं लङ्कावधि स्वस्थचेतसा ? । सोमाभिधानदेवत्वं सोमनाथ इति श्रुतम् ॥ ३३ ॥ शशाङ्कं मुकुटे धृत्वा तन्नाम शशिभूषणः । ईश्वरः सोमनाथाख्योऽवतरितः सोमेश्वरः ॥ ३४ ॥ जब तक लङ्काधिपति रावण के आने की अवधि हो, तब तक उसकी प्रतीक्षा में वह सोमराजा बड़े स्वस्थचित्त से उस शिवलिङ्ग राज की पूजा में रहे। इसलिए सोमराज राजा के द्वारा पूजित होने के कारण शिव वहाँ सोमाभिधान देवत्व के रूप में सोमनाथ नाम से विख्यात् हुए। इस प्रकार चन्द्रमा को अपने मुकुट में धारण करके और उसके ही नाम से शशिभूषण अर्थात् सोमनाथ नाम धरकर स्वयं ईश्वर शिव ही सोमनाथ कहलाकर सोमेश्वर के रूप में अवतरित हुए हैं। तदा सुरतरोर्वत्स प्रभासे भक्तिस्वागतः । जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३५ ॥ आरामनगरे रम्ये जगदाह्लादकारकः । जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३६ ॥ तब से ही हे वत्स! यह सुरतर देव प्रभास क्षेत्र में भक्ति के स्वागत से जगन्नाथ सोमनाथ से आए हैं जो तीनों ही लोकों में दुर्लभ है। अस्तु, यह सदा ध्यान में रखना चाहिए, बाग-बगीचों में, सुन्दर नगरों में ऐसे जगत को आनन्द प्रदान करने वाले जगन्नाथ सोमनाथ तीनों लोकों में भी दुर्लभ हैं। नाम्ना कैलासनगरे सोमनाथो महेश्वरः । संसारतारणो देवः संसारपाशछेदनः ॥ ३७ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां वाञ्छितार्थफलप्रदम् । सर्वतीर्थ महोत्साहं स्वर्गादिभोगभुक्तिदम् ॥ ३८ ॥ कैलास नामक नगर में भी सोमनाथ नाम के महेश्वर देव हैं जो कि संसार से तारण करवाकर संसार में पुनरागमन के पाश को ही काट देते हैं। ये सोमनाथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के वाञ्छित फल के दाता हैं और समस्त तीर्थों में सबसे महान और स्वर्गादिक भोग और मुक्ति प्रदाता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विष्णुवाक्योद्धवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयाधिकारो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु वाक्यानुसार अरण्य में उद्धूत श्रीसोमेश्वर निर्णय अधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥