भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194

146 अपराजितपृच्छा विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिं निर्णयो नामैकत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३१ ॥ विष्णुरुवाच — ततश्चानन्तरं वत्स प्रभासे भुक्तिमुक्तिदे। कृत्वा सोमेश्वरे भक्तिं पूजा स्यात्तु महोत्सवः ॥ १ ॥ चन्दनागुरुकङ्कोलकर्पूरैः कुङ्कुमादिकैः । पञ्चामृतादिस्नानैश्च धूपाद्यैश्च सुगन्धिभिः ॥ २ ॥ मन्त्रस्तोत्रगीतवाद्यैर्नृत्यैश्च सुरयोषिताम् । इन्द्राद्याश्च सुराः सर्वे ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वरः ॥ ३ ॥ विष्णुश्च भगवान् देवो मरीचिः काश्यपो गणाः । सूर्याद्याश्च ग्रहाश्चैव तथा चैवं गणोत्तमाः ॥ ४ ॥ अष्टौ च वसवः सिद्धा वासुक्याद्याश्च पन्नगाः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पार्थिवाश्चैव भूतले ॥ ५ ॥ पातालस्वः सप्तके च पृथिव्यां सप्तकं तथा । आनीताश्च त्रयो लोकाः सुरासुरनरोरगैः ॥ ६ ॥ प्रभासेन कृता पूजा देवदेवजगद्गुरोः । तुष्टः प्रभासं देवेशः पुत्रत्वं समुपागमत् ॥ ७ ॥ विष्णु बोले — हे वत्स! इसके उपरान्त ही भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले प्रभास क्षेत्र में भगवान् सोमेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करके महोत्सव होने लगे। चन्दन, अगरु, कङ्कोल, कर्पूर, कुङ्कुम और पञ्चामृत आदि से स्नान, धूप, सुगन्धित द्रव्यों से, मन्त्र-स्तोत्र, गीत-वाद्य-नृत्यों से देवाङ्गनाएँ और इन्द्रादि देवगण, ब्रह्मादि मुनीश्वर, भगवान् विष्णु देव, मरीचि, काश्यप गण, सूर्यादि सभी ग्रह और ऐसे ही अनेक उत्तम गणों और आठों वसु, सिद्धगण, वासुकि आदि समस्त नाग पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ क्षेत्र और भूतल पर जितने भी राजा, सातों पातालों, सातों पृथ्वी मण्डलों और तीनों लोकों के सुर-असुर-नर और नागों को निमन्त्रित करके प्रभास क्षेत्रवासियों ने देव देव जगद्गुरु महेश्वर की पूजा की जिससे सन्तुष्ट होकर देवेश भगवान् शिव महेश्वर ने प्रभास को पुत्रत्व प्रदान किया। वाचस्पतेर्भागिनेयं वसुहृन्नन्द्रदायकम्। प्रोवाच वचनं पुत्र एकादश ममांशकाः ॥ ८ ॥