अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (४५) कृतवती स्वाधिकारिणः श्रावयामासेत्यर्थः । किमि- त्यत आह ब्रह्मैव सर्वनामान्याकाशादिदेहांतान् संज्ञा- विशेषान् च पुनर्विविधानि रूपाण्यवकाशादिद्विपदां- तान् नानाविकारविशेषान् अपिशब्दश्चार्थे रूपग्रहणं गंधादिग्रहणस्याप्युपलक्षणं समग्राणि कर्म्माण्यकाश- प्रदानादीनि स्नानशौचादीन् क्रियाविशेषानपि बिभर्त्ति रज्ज्वादिकमिव सर्पादिप्रतिभासं दधात्यधिष्ठानदर्श- नशून्यान् प्रति दर्शयतीत्यर्थः ॥ ५० ॥ भा. टी. ब्रह्मही सम्पूर्ण प्रकारके नाम और नाना प्रकारके रूप धारणकरता है और नानाप्रकारके कर्म्म धारण करताहै । ऐसा साक्षात् श्रुति कहती है ॥ ५० ॥ सुवर्णाज्जायमानस्य सुवर्णत्वं च शा- श्वतम् ॥ ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं च तथा भवेत् ॥ ५१ ॥ सं. टी. अत्र लोकप्रसिद्धं दृष्टांतमाह सुवर्णेति सुगमम् ॥ ५१ ॥ भा. टी. जिसप्रकार सुवर्णसे कटक कुण्डलादिक बनाये जाते हैं जबतक कुण्डलादि आकार रहा तबलों रहा फिर गलानेसें सुवर्णका सुवर्णही होजाता है इसी प्रकार यह ब्रह्मसै उत्पन्न हुआ संसार जबलौं किसी आकारमें रहता है तबलौं रहता.है अन्तमें आकर दूर होने पर ब्रह्मही होता है ॥ ५१ ॥