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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (४५) कृतवती स्वाधिकारिणः श्रावयामासेत्यर्थः । किमि- त्यत आह ब्रह्मैव सर्वनामान्याकाशादिदेहांतान् संज्ञा- विशेषान् च पुनर्विविधानि रूपाण्यवकाशादिद्विपदां- तान् नानाविकारविशेषान् अपिशब्दश्चार्थे रूपग्रहणं गंधादिग्रहणस्याप्युपलक्षणं समग्राणि कर्म्माण्यकाश- प्रदानादीनि स्नानशौचादीन् क्रियाविशेषानपि बिभर्त्ति रज्ज्वादिकमिव सर्पादिप्रतिभासं दधात्यधिष्ठानदर्श- नशून्यान् प्रति दर्शयतीत्यर्थः ॥ ५० ॥ भा. टी. ब्रह्मही सम्पूर्ण प्रकारके नाम और नाना प्रकारके रूप धारणकरता है और नानाप्रकारके कर्म्म धारण करताहै । ऐसा साक्षात् श्रुति कहती है ॥ ५० ॥ सुवर्णाज्जायमानस्य सुवर्णत्वं च शा- श्वतम् ॥ ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं च तथा भवेत् ॥ ५१ ॥ सं. टी. अत्र लोकप्रसिद्धं दृष्टांतमाह सुवर्णेति सुगमम् ॥ ५१ ॥ भा. टी. जिसप्रकार सुवर्णसे कटक कुण्डलादिक बनाये जाते हैं जबतक कुण्डलादि आकार रहा तबलों रहा फिर गलानेसें सुवर्णका सुवर्णही होजाता है इसी प्रकार यह ब्रह्मसै उत्पन्न हुआ संसार जबलौं किसी आकारमें रहता है तबलौं रहता.है अन्तमें आकर दूर होने पर ब्रह्मही होता है ॥ ५१ ॥

( ४६ ) अपरोक्षानुभूतिः । स्वल्पमप्यंतरं कृत्वा जीवात्मपरमा- त्मनोः ॥ यः संतिष्ठति मूढात्मा भयं तस्याभिभाषितम् ॥ ५२ ॥ सं. टीः एवं कर्तृकर्मादिकारकघटस्यैकाधिष्ठानरू- पत्वे सिद्धेपि भेददर्शिनो भयमाह स्वल्पेति । स्वल्पम- प्यंतरमुपास्योपासकरूपं भेदं कृत्वा कल्पयित्वा यस्तिष्ठति तस्य भयं भाषितम् "यदा ह्येवैष एत- स्मिन्नुदरमंतरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति ” इत्या- दिश्रुत्येत्यर्थः ॥ ५२ ॥ भा. टी. जो पुरुष जीवात्मा और परमात्मामें कुछभी भेद करै है और मानै है वह मूढ पुरुष भयको प्राप्त होय है अर्थात् उसके चित्तको कदापि शान्ति नहीं होयहै ॥ ५२ ॥ यत्राज्ञानाद्भवेद्द्वैतमितरस्तत्रपश्यति॥ आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चा ण्वपि ॥ ५३ ॥ सं. टीः ननु प्रकाशतमसोरिवपरस्परविरुद्धस्वभा- वयोर्द्वैताद्वैतयोः कुत एकाधिकरणत्वमित्याशंक्याव- स्थाभेदादित्याह यत्रेति यत्र यस्यामज्ञानावस्थायां अज्ञानेन द्वैतमिव भवेत्तत्रतस्यामज्ञानावस्थायाम् "इत रोऽन्योऽन्यत्पश्यति यत्रहि द्वैतमिव भवति तदितर इ- तरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं शृणोति

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (४७) तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदि- तर इतरं विजानातीति यत्र वाऽन्यदिव स्यात्तत्रान्यो- न्यत्पश्येदन्योन्यञ्जिघ्रेदन्योऽन्यद्रसयेत्” इत्यादिश्रुतेः चशब्दः पूर्वोक्ताद्वैलक्षण्यं सूचयति यदा यस्मिन् ज्ञानकाले सर्वमात्मत्वेन भवेत् तत्र तस्मिन् ज्ञानकाले इतरोऽपि किंचिदप्यन्यन्नपश्यति यत्रवा “अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं जिघ्रेत्” इत्या- दिश्रुतेः सकार्याज्ञाननिवृत्त्या न द्वैतमिति भावः॥५३॥ भा. टी. जिस अवस्थामैं अज्ञान दशासे द्वैत होयहै उसी अवस्थामैं एक पदार्थ दूसरे पदार्थका दर्शन करै है जब आत्मज्ञान होजाय है तब किसीको कुछ अन्य नहीं मालूम होयहै ॥ ५३ ॥ यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः ॥ न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः ॥ ५४ ॥ सं. टी. ननु द्वैतादर्शने कः पुरुषार्थ इत्याशंक्य तत्प्रतिपादिकाम्“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजा- नतः तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” इति श्रुतिमर्थः पठति यस्मिन्निति । यस्मिन्नवस्थाविशेषे सर्वाणि भूतान्यात्मत्वेनात्मभावेन विजानतः अपरो- क्षेण साक्षात्कुर्वतोऽधिकारिणः पुरुषस्य तस्येति षष्ठी

( ४८ ) अपरोक्षानुभूतिः सप्तम्यर्थे तस्मिन्नवस्थाविशेषे वै निश्चयेन मोहो भ्रमो नभवेच्च पुनः शोको व्याकुलतापि न भवेत् उभयत्र हेतुः अद्वितीयतः तत्कारणाभावादित्यर्थः ॥ ५४ ॥ भा. टी. जिस अवस्थामें पुरुष. सर्व प्रपंचको आत्मरूप मानै है उस अवस्थामें मनुष्यको अद्वैतज्ञान होनेसे शोक मोह नहीं होयहै ॥ ५४ ॥ अयमात्मा हि ब्रह्मैव सर्वात्मकतया स्थितः ॥ इति निर्धारितं श्रुत्याबृहदा- रण्यसंस्थया ॥ ५५ ॥ सं. टी. शोककारणद्वैताभावे प्रमाणमाह अयमिति “ सवा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयः ” इत्यादिरूपये त्यर्थः । शेषंस्पष्टम् ॥ ५५ ॥ भा. टी. "सवा अयमात्मा ब्रह्मविज्ञानमयः" परमात्मस्वरूप ब्रह्मही सर्वात्मकरूप स्थितहै ऐसा बृहदारण्य उपनिषद्की श्रुतिने निश्चय किया है ॥ ५५ ॥ अनुभूतोऽप्ययंलोकोव्यवहारक्षमोऽपि सन् ॥ असद्रूपो यथास्वप्न उत्तरक्षण- बाधतः ॥ ५६ ॥ स्वप्नोजागरणेऽलीकः स्वप्नेपि जागरो नहि ॥ द्वयमेव लये नास्ति लयोपि ह्युभयोर्न च ॥ ५७ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ४९ ) सं. टी. नन्वयंलोक एव तत्कारणे सति कथं शोका- द्यभाव उच्यत इत्याशंक्य सदृष्टांतमाह अनुभूत इति स्पष्टम् ॥ ५६ ॥ दृष्टांतं विवृण्वन्नुक्तन्यायमन्यत्राप्य- तिदिशति स्वप्न इति अलीको मिथ्या द्वयं स्वप्नजागरणे लये सुषुप्तौ शेषं स्पष्टम् ॥ ५७ ॥ भा. टी. जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें स्वप्न देखाहुआ पदार्थ सम्पूर्ण सत्स्वरूप मालूम पडै है स्वप्नसे दूसरेक्षणमें जगते ही सब असत् स्वरूप हो जाय है इसी प्रकार इस संसारका व्यवहार सत्य मालूम होयहै और असत् स्वरूप होयहै जाग्रत् अवस्था में स्वप्न मिथ्या मालूम होयहै स्वप्ना अवस्थामें जाग्रत मिथ्या मालूम होय है और सुषुप्ति अवस्थामें स्वप्न जाग्रत् दोनों मिथ्या होयहैं इसी प्रकार स्वप्न और जाग्रत् अवस्थामें सुषुप्ति मिथ्या प्रतीत होयहै ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ त्रयमेवं भवेन्मिथ्या गुणत्रयविनिर्मि- तम्॥अस्य द्रष्टा गुणातीतो नित्यो ह्ये- कश्चिदात्मकः ॥ ५८ ॥ सं. टी. उक्तमुपसंहरन्फलितमाह त्रयमिति त्रयं जाग्रदाद्यवस्थात्रयमेव युक्तपरस्परव्यभिचारेण मिथ्या मिथ्यात्वे हेतुः गुणेति गुणत्रयविनिर्मितं मायाकल्पित- मित्यर्थः तर्हि किंसत्यमतआह अस्येति अस्यअवस्था त्रयस्य शेषंस्पष्टम् ॥ ५८ ॥ ३

( ५० ) अपरोक्षानुभूतिः । भा. टी. सतोगुण रजोगुण तमोगुणसे बने हुए जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनो ऊपर कहे हुए प्रकारसे मिथ्या होयहैं इन तीनों अवस्थाओंका साक्षी गुणातीत अर्थात गुणरहित चिन्मय अर्थात् चैतन्य स्वरूप सत्य है ॥ ५८ ॥ यद्वन्मृदि घटभ्रांतिं शुक्तौ वा रज- तस्थितिम् ॥ तद्वद्ब्रह्मणिजीवत्वं वी- क्ष्यमाणे न पश्यति ॥ ५९ ॥ सं. टी. नन्ववस्थात्रयं मिथ्याभवतु जीवस्तु सत्यः स्यादित्याशंक्य सदृष्टांतमुत्तरमाह यद्वदिति ब्रह्मणि वीक्ष्यमाणे आत्मत्वेन साक्षात्कृते सति जीवत्वं न प- श्यतीत्यन्वयः अन्यत्स्पष्टमेव ॥ ५९ ॥ भा. टी. यदि आत्मामें गुणत्रय मिथ्या है तौ जीवही सत्य हो तहां कहै है । जिस प्रकार मृत्तिकामें घटकी भ्रान्ति है परन्तु घट नष्ट होनेपर मृत्तिकाही दृष्टिगोचर होयहै और जैसे शुक्तिमें चांदीकी भ्रान्ति होय है और जब समीपजाके देखै है तों सीपी होयहै इसी प्रकार जबतक आत्माका ज्ञान नहीं होय तब जीव है ऐसी प्रतीति होय है परंतु ब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे जीवको नहीं देखैं है ॥ ५९ ॥ यथामृदि घटोनामकनकेकुण्डलाभि- धा ॥ शुक्तौ हिरजतख्यातिर्जीवशब्द्- स्तथा परे ॥ ६० ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५१ ) सं. टी. अज्ञानावस्थायां प्रतीयमानो यो जीवब्रह्म- भेदः स नाममात्र इति बहुदृष्टांतैराह यथेति रजतस्य ख्यातिराख्या नामेति यावत् परे परब्रह्मणि जीवशब्द- स्तथा शेषं स्पष्टम् ॥ ६० ॥ भा. टी. अज्ञान अवस्थामें जो जीव ब्रह्मका भेद भासै है सो केवल नाममात्र होय है वस्तुतः मृत्तिका होय परन्तु घट ऐसा नाममात्र होयहै और सुवर्ण होयहै परन्तु कटक कुण्डल ऐसा नाममात्र होयहै सीपी होयहै परन्तु मायावश पुरुष रजत कहने लगे है इसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्म होय है तबभी ब्रह्ममें जीवसंज्ञा होय है सो नाममात्र है वस्तुतः मिथ्या है ॥ ६० ॥ यथैवव्योम्निनीलत्वं यथानीरं मरुस्थ ले ॥ पुरुषत्वं यथास्थाणौ तद्वद्विश्वं चिदात्मनि ॥ ६१ ॥ सं. टी. न केवलं जीव एव नाममात्रः किंतु सर्व्ववि- श्वमपि ब्रह्मणि नाममात्रमित्यनेकदृष्टांतैराह यथैवेति स्पष्टम् ॥ ६१ ॥ भा. टी. केवल जीवही नाममात्र नहींहै किन्तु सम्पूर्ण विश्व- ही नाममात्र है जैसे आकाशमें वस्तुतः कुछ नहीं है परन्तु नीलापन मालूम होयहै और जैसे मारवाड़की भूमिमें वस्तुतः जल नहीं है परन्तु भ्रान्तीसे जल मालूम होय है और जैसे अन्धकार दोषसे रात्रिमें ठूंठ पुरुष मालूम होय है परन्तु वस्तुतः

( ५२ ) अपरोक्षानुभूतिः । पुरुष है नहीं इसी प्रकार यह संसार परमात्मा ब्रह्मके विषै भिन्न और सत्यसा प्रतीत होय है परन्तु वस्तुतः कुछभी नहीं है ॥ ६१ ॥ यथैवशून्ये वैतालो गंधर्वाणांपुरंयथा ॥ यथाकाशे द्विचंद्रत्वं तद्वत्सत्ये जग- त्स्थितिः ॥ ६२ ॥ सं. टी. नाममात्रप्रपंचस्य मिथ्यात्ववासनादार्ढ्यायै- ममेवार्थं बहुभिर्लोकप्रसिद्धदृष्टांतैः प्रपंचयति यथैवशून्य इत्यादि त्रिभिः शून्ये निर्जने देशे वैतालः अकस्मादा- भासमानो भूतविशेषः गंधर्वपुरस्यापि शून्याधिष्ठानत्वं ज्ञेयं गंधर्वनगरं नाम राजनगराकारो नीलपीतादिमेघर- चनाविशेषः आकाशे स्पष्टमन्यत् ॥ ६२ ॥ भा. टी. जिसप्रकार निर्जन स्थानमें अकस्मात् प्रत्यक्ष होकर वैताल ( भूत विशेष ) मालूम होयहै परन्तु वस्तुतः मिथ्या होयहै और जैसे निर्जन स्थानमें नीले पीले मेघोंसे बना हुवा गन्धर्वोंका नगर मालूम होने लगे है परन्तु वहभी वस्तुतः मिथ्या होयहै और जैसे आकाशमें किसी समय किसी कारण भ्रान्तिसे दो चंद्रमा मालूम होने लगे हैं इसी प्रकार सत्यस्वरूप आत्मामें जगत सत्यसा प्रतीत होयहै वस्तुतः सत्य नहीं है ॥ ६२ ॥ यथातरंगकल्लोलैर्जलमेवस्फुरत्यलम् ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५३) पात्ररूपेण ताम्रं हि ब्रह्मांडौघैस्तथा- त्मता ॥ ६३ ॥ सं. टी. यथा तरंगेति सुगमम् ॥ ६३ ॥ भा. टी. जिसप्रकार जलही तरङ्गरूप देखनेमें आवैहै और ताम्रही पात्राकार देखनेमें आवैहै इसीप्रकार आत्माही ब्रह्माण्डाकार होकर दृष्टिगोचर होयहै ॥ ६३ ॥ घटनाम्नायथा पृथ्वी पटनाम्नाहि तं- तवः॥जगन्नाम्नाचिदाभाति ज्ञेयं तत्तद भावतः ॥ ६४ ॥ सं. टी. किंच घटेति तत्र पादत्रयं स्पष्टं ननु किम- नेन मिथ्यात्ववासनादाढर्येनेत्यत आह ज्ञेयमिति तद्- भावतो नामाभावतस्तद्ब्रह्म ज्ञेयम् “वाचारंभणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” इत्यादिश्रुतेः ॥ ६४ ॥ भा. टी. जैसे संसार मृत्तिका घटनाम करके प्रसिद्ध होय है और तन्तु पटनाम करकै प्रसिद्ध होयहै इसीप्रकार जीव नाम करकै संसारमें चिद्रूप आत्मा प्रसिद्ध होयहै सो मिथ्या है क्योंकि संसारके व्यवहारके वास्ते नाम संकेत मात्र होयहै ॥ ६४ ॥ सर्वोपि व्यवहारस्तु ब्रह्मणा क्रियते ज- नैः ॥ अज्ञानान्न विजानंति मृदेव हिघ टादिकम् ॥ ६५ ॥

( ५४ ) अपरोक्षानुभूतिः । सं. टी. ननु “ यत्र हि द्वैतमिव भवति ” इत्यादि श्रुत्यर्थदर्शनेनावस्थात्रये विदेहमोक्षावुक्तौ नतु जी- वन्मोक्ष इत्याशंक्याहः सर्वइति सर्वोऽपि लौकिको वैदिक- श्चेति शेषंस्पष्टम्, अयं भावः अज्ञानानिवृत्तिरेवं जीवन्मु- क्तिर्नतु द्वैतादर्शनमिति ॥ ६५ ॥ भा. टी. लोककी जीवन्मोक्षअवस्था दिखावें हैं क्यों कि (“यत्र हि द्वैतमिव भवति”) जिसमें ज्ञान होनेपर द्वैतकेसा व्यवहार किया जायहै वह जीवन्मोक्ष विदेह 'मोक्ष' से विल- क्षण तीसरी अवस्था कहलावैहै तिस जीवन्मोक्ष अवस्थामें सब लोक परब्रह्मके नियमानुसार सब प्रकार लौकिक और वैदिक कार्य्य करै है ऐसाहै संसारी पुरुष तबभी अज्ञानवशसे कोईभी ब्रह्मको जाननेको समर्थ नहीं होयहै जैसे यद्यपि घट मृत्ति- काही है तथापि मृत्तिका कहनेको समर्थ नहीं होयहै आशय यहहै कि लोक यह नहीं जाने है कि लोकव्यवहारकेही कारण द्वैत व्यवहार किया जायहै वस्तुतः अज्ञानकी निवृत्तिका नाम ज्ञान है और लोकव्यवहारमेंभी अद्वैत व्यवहार करनेका नाम ज्ञान नहीं है ॥ ६५ ॥ कार्यकारणतानित्यमास्ते घटमृदोर्य- था ॥ तथैवश्रुतियुक्तिभ्यां प्रपंचब्रह्म- णोरिह ॥ ६६ ॥ सं. टी. तत्रहेतुं सदृष्टांतमाह कार्येति, “यथा सौम्यै-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५५ ) केन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्" इत्यादिश्रुतिः युक्तिस्तु कार्यकारणयोरन्यत्वे एककारणज्ञानात्सर्व- कार्यज्ञानं न स्यादित्यादि । सुगममन्यत् ॥ ६६ ॥ भा. टी. जैसे सदा घट और मृत्तिकाका कार्य्यकारण भाव देखनेमें आवैहै तिसी प्रकार श्रुतियोंसे और युक्तियोंसे प्रपञ्च अर्थात् जगत् और ब्रह्मका कार्य्य कारण भाव जाना जायहै ॥ ६६ ॥ गृह्यमाणेघटेयद्वन्मृत्तिकायातिवैबला- त् ॥ वीक्ष्यमाणेप्रपंचेपि ब्रह्मैवाभाति भासुरम् ॥ ६७ ॥ सं. टी. कार्यकारणयोरनन्यत्वमेव दृष्टांतेन स्पष्टयति गृह्यमाण इति भासुरं प्रमाणनिरपेक्षतयैव भासन- शीलं स्पष्टमन्यत् ॥ ६७ ॥ भा. टी. जैसे घटके विषयमें विचार करते करते अन्तमें मृत्तिकाही निश्चय होयहै इसीप्रकार इस संसारके विषयमें विचार करते करते बिना प्रमाणोंके प्रकाशवान् ब्रह्मही प्रतति होय है ॥ ६७ ॥ सदैवात्मा विशुद्धोऽस्ति ह्यशुद्धो भाति वै सदा ॥ यथैव द्विविधारज्जुर्ज्ञानिनो ऽज्ञानिनोऽनिशम् ॥ ६८ ॥ सं. टी. ननु ब्रह्मणि भासमाने प्रपंचो न भासेतेत्या

( ५६ ). अपरोक्षानुभूतिः । शंक्यावस्थाभेदेनोभयमपि भासत इति सदृष्टांतमाह सदैवेति तत्रज्ञानिनः सदैवात्मा विशुद्धः अज्ञानतत्का- र्यप्रपंचमलरहितत्वान्निष्प्रपंचोस्ति अज्ञानिनस्तु सदै- वाशुद्धोऽस्तीति भ्रमाद्विभाति वैहीति . तत्प्रसिद्धौ उभयत्रापि दृष्टांतः यथेति यथा रज्जुज्ञानिनः सर्पाभा वतया निर्विषत्वेनाभयंकरि अज्ञानिनस्तु सर्परूपतया विपरीतत्वेन भयंकरीति द्विविधा भाति अयंभावः ब्रह्म यद्यपि स्वयंप्रकाशत्वेन सदा भात्येव तथापि वृत्त्या- रूढत्वेन पुरुषार्थोपयोगीति ज्ञानिनः प्रतिभाति ना- ज्ञानिनः सूर्यदीपादिरिवचक्षुष्मदंधयोरितिदिक् ॥ ६८ ॥ भा. टी. जैसे एकहीरज्जु अज्ञानी पुरुषोंको भ्रमसे सर्प मालूम होयहै और ज्ञानवान् पुरुषोंको रज्जुही मालुम होजाय है इसीप्रकार एकही परमात्मा सर्वदा ज्ञानियोंको शुद्धस्वरूप और प्रकाशवान् मालूम होयहै .और अज्ञानियोंको शुद्धस्व रूप और प्रकाशवान् नहीं मालूम होयहै वस्तुतः परमात्मा शुद्धस्वरूप और प्रकाशवान्है ॥ ६८ ॥ यथैवमृन्मयः कुंभस्तद्वद्देहोपिचिन्म- यः ॥ आत्मानात्मविभागोयं मुधैव- क्रियतेऽबुधैः ॥ ६९ ॥ सं. टी. नन्वात्मा यदि सदैव निष्प्रपंचत्वेन भाति तर्हि किमर्थं देहात्मभेदो वर्णित इत्याशंक्याविवेकिनो

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५७) देहव्यतिरिक्तात्मबोधार्थं विवेकिनस्तु व्यर्थ एवेति सह- दृष्टांतमाह यथेति तत्राऽबुधैरित्यऽकारप्रश्लेषे मुधैवार्कियते अपि तु नेति काकुव्याख्यानम् अन्यत्सर्वं सुगमम्॥६९॥ भा. टी. यदि आत्मा सदा निष्प्रपञ्च भासमान होयहै तब आत्मा और देहका भेद क्यों कर दिखायाहै । ऐसी शंका होनेपर कहें हैं । जैसे कुम्भ मृत्तिकामय होयहै तिसीप्रकार देह चैतन्यस्वरूप आत्ममय होयहै इसीकारण ज्ञानी पुरुषको तौ आत्मा और देहका भेद मिथ्याहै ॥ ६९ ॥ सर्पत्वेनयथारज्जूरजतत्वेनशुक्तिका॥ विनिर्णीताविमूढेन देहत्वेनतथात्मता७०॥ सं. टी. इदानीमविवेकिनः कल्पितदेहेतादात्म्यं स- दृष्टांतमाह सर्पत्वेनेति ॥ ७० ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष रज्जुको सर्प मानलेयहै और सीपीको चांदी मानलेयहै इसीप्रकार आत्माको देह अ- ज्ञानीकी कल्पनारूप निर्णय करै है ॥ ७० ॥ घटत्वेनयथापृथ्वी पटत्वेनैवतंतवः ॥ विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्म- ता ॥ ७१ ॥ सं. टी. घटत्वेनेति ॥ ७१ ॥ भा. टी. जैसे अज्ञानी पुरुष मृत्तिकाको घट मानैहै और

श्लोकानामर्थः स्फुटतर एवास्त्यतो न व्याख्यानं

( ५८ ) अपरोक्षानुभूतिः । तन्तुओंको पट मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७१ ॥ कनकं कुंडलत्वेन तरंगत्वेनवैजलम् ॥ विनिर्णीता० ॥ ७२ ॥ सं. टी. कनकमिति ॥ ७२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष सुवर्णकूं कुंडल मानै है और जलको तरङ्गरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७२ ॥ पुरुषत्वेयथास्थाणुर्जंलत्वेनमरीचिका ॥ विनिर्णीता० ॥ ७३ ॥ सं. टी. पुरुषत्व इति ॥ ७३ ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष शाखाहीन वृक्ष अर्थात् ठूंठवृक्षको पुरुषरूप मानैहै और मरुमरीचिकाको जलरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देह रूप निर्णयकरै है ॥ ७३ ॥ गृहत्वेनैव काष्ठानिखड्ग त्वेनैवलोहता ॥ विनिर्णीता० ॥ ७४ ॥ सं. टी. गृहत्वेनेति सर्पत्वेनेत्यादि पंचानामप्येतेषां श्लोकानामर्थः स्फुटतर एवास्त्यतो न व्याख्यानं कृतम् ॥ ७४ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५९ ) भा. टी. जिसतरह बहुत सारे काष्ठोंके समूहको अज्ञानी घर मानलेयहै और लोहेको तलवार मानलेयहै तिसीप्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७४ ॥ .यथा वृक्षविपर्यासो जलाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्य- ज्ञानयोगतः ॥ ७५ ॥ सं. टी. नन्वन्यथा निर्णये किंकारणमितिचेत्तदज्ञा- नमेवेति सदृष्टांतमाह यथा वृक्षेत्यादि द्वादशभिः॥७५॥ भा. टी. जिस जलमें वृक्षकी छाया पडै है और अज्ञानी पुरुष उस प्रतिबिम्बकोही साक्षात् वृक्षमान लेय तिसीप्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७५ ॥ पोतेन गच्छतः पुंसः सर्वं भातीवचंच- लम् ॥ तद्वदा० ॥ ७६ ॥ सं. टी. पोतेनेति पोतेन नौकया स्पष्टमन्यत्॥७६॥ भा. टी.जिस प्रकार जिहाजनौकामें चढकर जानेवाले पुरुष- को सब चलताहुआ मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७६ ॥ पीतत्वं हियथा शुभ्रे दोषाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्व० ॥ ७७ ॥ सं. टी. पीतत्वमिति ॥ ७७ ॥

( ६० ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषको पित्तदोषसे कमल वाय हो जाय है और श्वेत वस्तुभी पीली मालूम होने लगेहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥७७॥ चक्षुर्भ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्वं भातिभ्र- मात्मकम् ॥ तद्व० ॥ ७८ ॥ स. टी. चक्षुर्भ्यामिति ॥ ७८ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषके नेत्रोंमें भ्रम होय है अर्थात् घूमनेकी बीमारी होयहै उस पुरुषको सम्पूर्ण पदार्थ घूमते हुए मालूम होयहैं तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७८ ॥ अलातं भ्रमणेनैव वर्त्तुलं भाति सूर्य्य- वत् ॥ तद्वदा० ॥ ७९ ॥ सं. टी. अलातमिति ॥ ७९ ॥ भा.टी. जिसप्रकार जलाहुआ मुराड घुमानेसे वह सूर्य्यकी नाईं वर्त्तुलाकार मालूम होयहै तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७९ ॥ महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं ह्यति दूरतः॥ तद्वदा० ॥ ८० ॥ सं. टी. महत्त्व इति हीति सर्वलोकप्रसिद्धौ ॥८०॥ भा. टी. जिस प्रकार बहुत बडी वस्तुभी अत्यन्त दूरसे

संस्कृतटीका-भाषार्टीकासहिता । ( ६१ ) अतिसूक्ष्मकी तरह दीखै है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८० ॥ सूक्ष्मत्त्वेसर्वभावानां स्थूलत्वं चोपने- त्रतः ॥ तद्वदा० ॥ ८१ ॥ सं. टी. सूक्ष्मत्वेइति ॥ ८१ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अतिसूक्ष्म वस्तुओंकाभी उपनेत्र अर्थात् दूरवीन आदिसे अतिस्थूल वस्तुकी तरह बोध होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥८१॥ काचभूमौजलत्वंवा जलभूमौहिका चता ॥ तद्वदा० ॥ ८२ ॥ सं. टी. काचभूमाविति ॥ ८२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार काँचकी भूमिमें जलकी बुद्धि होय है और जलकी भूमिमें काँचकी बुद्धि होयहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहज्ञान है ॥ ८२ ॥ यद्वदग्नौ मणित्वं हि मणौ वा वह्निता पुमान् ॥ तद्वदा० ॥ ८३ ॥ सं. टी. यद्वदिति ॥ ८३ ॥ भा. टी. जिस प्रकार भ्रमसे अग्निमें मणिकी बुद्धि होय है और मणिमें अग्निकी बुद्धि होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८३ ॥

( ६२ ) अपरोक्षानुभूतिः अभ्रेषु सत्सु धावत्सु सोमो धावति भाति वै ॥ तद्वदा० ॥ ८४ ॥ सं. टी. अभ्रेष्विति ॥ ८४ ॥ भा. टी. जिस प्रकार आकाशमें मेघोंके दौडनेसे चन्द्रमा दौडतासा मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मा में देहका ज्ञान है ॥ ८४ ॥ यथैवदिग्विपर्यासो मोहाद्भवति कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८५ ॥ सं. टी. यथेति : यथावृक्षेत्यादिश्लोकानां स्फुटार्थ त्वात्पिष्टपेषणतुल्यत्वेन न व्याख्यानं कृतम् ॥ ८५ ॥ भा. टी. जिस प्रकार मोह वशसे किसीको दिशाओंमें भ्रम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ८५ ॥ यथाशशी जले भाति चंचलत्वेन कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८६ ॥ सं. टी. यथाशशीति शशीत्युपलक्षणं सूर्यादीना- मपि शेषं स्पष्टम् ॥ ८६ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसीको किसी समय जलके हिलनेसे चन्द्रका प्रतिबिम्ब हिलनेसे चन्द्रमा हिलैहै ऐसा बोध होय इसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८६ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता ( ६३ ) एवमात्मन्यविद्यातो देहाध्यासो हि जायते ॥ एवमात्मपरिज्ञानाल्लीयते च परात्मनि ॥ ८७ ॥ सं. टी. एवं द्वादशभिः श्लोकैरुक्तमर्थमुपसंहरति एवमिति एवमुक्तेनप्रकारेणात्मन्यविद्यातः आत्माज्ञा- नात् देहाध्यासो मनुष्योऽहमित्यादिबुद्धिर्जायते भवति हीति प्रसिद्धौ नन्वेतस्य निवृत्तिः कुतोभवेदिति चेदा- त्मज्ञानादेवेत्याहोत्तरार्धेन सइति सएव देहाध्यास ऐवा- त्मपरिज्ञानात् ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारात्परात्मनि अज्ञा- नतत्कार्यरहिते प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मणि लीयते ब्रह्मस्वरूपे णावतिष्ठते नह्यधिष्ठानंविनाऽऽरोपितस्य स्वरूपमस्ति चकारादध्यासकारणमज्ञानमपि लीयतइति अन्यथाऽध्या सल्याभावादित्यर्थः नहि कारणे सतिकार्यस्य लयः संभवति तस्मादात्मज्ञानादेव सकारणकार्याध्यासनिवृ त्तिरित्यलं पल्लवितेन ॥ ८७ ॥ भा. टी. इस प्रकार आत्मामें देहाध्यास अर्थात् देह ज्ञान होय है और जब आत्माका तत्वपरिज्ञान होयहै तब वह देहाध्यास परमात्मामें लीन होजाय है अर्थात् देहका ज्ञान आत्मज्ञानमें लय होजायं है ॥ ८७ ॥ सर्वमात्मतयाज्ञातं जगत्स्थावरजंग

( ६४ ) अपरोक्षानुभूतिः । मम् ॥ अभावात्सर्वभावानांदेहस्य चा- त्मता कुतः ॥ ८८ ॥ सं. टी. एतदेव विवृणोति सर्वमिति आत्मता देह- स्य नेत्यर्थः स्पष्टमन्यत् ॥ ८८ ॥ भा. टी. जब स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप मालूम होने लगे है तब सब पदार्थोंके अनित्य होनेसे देह जो आत्मा किस प्रकार होसके है अर्थात् कभीभी नहीं होय है ॥ ८८ ॥ आत्मानंसततंजानन्कालंनयमहाद्यु- ते ॥ प्रारब्धमखिलंभुंजन्नोद्वेगंकर्तुम- र्हसि ॥ ८९ ॥ सं. टी. ननु ज्ञानिनो निष्प्रपंचात्मतया मम किं स्यात् ब्रह्मण्यभोजनेनान्यस्तृप्यतीतिचेदतआह आत्मानमि- ति भोमहाद्युते कामादिपराभवेन स्वहितसाधनोन्मु- खस्त्वं आत्मानं प्रत्यगभिन्नं सततं आसुप्तिमृतिपर्यन्तं जानन् वेदांतवाक्यैर्विचारयन् कालं नयातिक्रामस्व, विचारसाध्यज्ञानानंतरं चाखिलं प्रारब्धं चरमदेहारं- भकं कर्म भुंजन् सुखदुःखाभासानुभवेन क्षपयन्समुद्वेगं कर्तुनाहर्सीत्यर्थः ॥ ८९ ॥ भा.टी. हे महामते ! सदा आत्माको जानता हुआ सम- यको व्यतीत कर समस्त प्रारम्भ किये हुए कर्म्मके फलको भोगता हुआ उद्वेग मत कर ॥ ८९ ॥