आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आर्य्यभटीयम्- श्रीकृष्णलीला·की आधिदैविक व्याख्या की अवतरणिका ॥ चन्द्रमा पौराणिक देवता हैं। ३३ नक्षत्र पुराणों में चन्द्रमा की ३३ स्त्री अ- श्विनी, भरणी, प्रभृति, (नक्षत्र) चन्द्रमा का घर या गृहिणी हैं। इस स्थल में रूपक अति जाज्वल्यमान है किसी को समझने में कष्ट नही होता किन्तु पुराणों में ऐसे अनेक (हमारे शास्त्रों में प्रायः तीन प्रकार के वर्णन हैं एक आध्यात्मिक दू- सरा आधिदैविक और तीसरा आधिभौतिक) रूपक हैं, जिनका रूपकत्व भाव सहसा उपलव्धि नहीं किया जाता। श्रीकृष्ण नामक कोई व्यक्ति थे नहीं ऐसा कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है, प्रत्युत ऐसे प्रमाण तो भले ही पाये जाते हैं कि श्रीकृष्ण नामक एक अच्छे आदर्श पुरुष या पुरुषोत्तम सच्चरित्र व्यक्ति हुए हैं जिनका इतिहास महाभारत में है। एवं श्रीकृष्ण सम्बन्धी इस इतिहास के अतिरिक्त भागवत आदि पुराणोक्त ऐसे निन्दनीय उपाख्यान हैं जिन को लेकर विधर्मी लोग हमारे वेदोक्त स०आ० धर्म तथा हमारे महात्माओं पर कलङ्क दिखलाते हैं जिनका यथोचित समाधान हमारे भाई लोग न जानने के कारण नहीं कर सकते । वेद तथा वेदाङ्ग आदि वैदिक ग्रन्थों के देखने से पुराणोक्त उपाख्यानों का तात्पर्य समझ में आता है । जैसा कि पाठकों को वक्ष्यमाण उपाख्यान से ज्ञात होगाः-वैदिक काल से सूर्य, उपास्य देव होते आये हैं, आब्राह्मण चाण्डाल पर्यन्त सब ही आर्य्य इस समय भी शय्या से गात्रोत्थान कर, पूर्व मुंह हो सूर्यदेव को प्रणाम किया करते हैं; सूर्यदेव ही गायत्री के उपास्य देवता हैं। शालग्राम शिला आदि उपलक्ष्य कर जिस प्रकार ईश्वर की उपासना की व्यवस्था मानी जाती है, उसी प्रकार सूर्य को भी उपलक्ष्य कर ईश्वरोपासना की व्यवस्था की गई है। श्रीकृष्ण और अन्यान्य १० अवतार, सब ही विष्णु के अवतार कहे जाते हैं। श्रीकृष्ण नाम से कोई व्यक्ति अवतीर्ण हुए, जब यह स्वीकार कर लिया गया, और वे अवतार कहकर माने भी गये तब उन के जीवन के साथ विष्णु या सूर्य (कारण वेद में विष्णु और सूर्य एक) की लीला मिश्रित कर देना असम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण की बाल्य- लीला के साथ जो सूर्य की लीला मिश्रित हुई है। इस के बहुत प्रमाण पाये जाते हैं । बाल्य-लीला यदि इस प्रकार रूपक के ऊपर न्यस्त न किया जाता, तो परम पवित्र गीता शास्त्र के प्रवर्त्तक के चरित्र में “परदाराभिम- र्शन” दोष अवश्य ही लगता । परीक्षित राजा ने श्रीकृष्ण जी की बाल्य- लीला सुनकर शुकदेव जी से इस प्रकार प्रश्न किया था किः-