भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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भूमिका ९ "संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्यंच । अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥ सं कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्त्ताभिरक्षिता । प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥ आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वैजुगुप्सितम् । किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत ! ॥” जिस संशय ने राजा परीक्षित के मन को डवाडोल वा सन्दिग्ध कर दिया था वही संशय आज अनेक लोगों के मन में उठता है। स्वतः ही लोगों के मन में यह प्रश्न होता है कि धर्मसंस्थापनार्थ और अधर्म के नाश के लिये जिन का जन्म हुआ है वे परस्त्रीगमन रूप अकार्य वा कुत्सित कर्म में क्यों कर प्रवृत्त होंगे ? । या तो यह कोई आध्यात्मिक व्यापार है या कि- सी ज्योतिष शास्त्रोक्त विषय का रूपक है। राधा को ह्लादिनी शक्ति (अ- ध्यात्म) मानना पड़ेगा या राधा को “राधा” नक्षत्र मानना पड़ेगा । नहीं तो अवतार की मर्यादा की रक्षा नहीं होती । शुकदेव जी के मुख से जो राजा परीक्षित के प्रश्न का उत्तर दिया गया है उसे कोई भी सन्तोष-जनक (उत्तर) नहीं मान सकता । “ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्” ॥ यह बात सुनने से किसी के मन की शङ्का नहीं जाती तो परीक्षित का भी सन्देह दूर हुआ हो या नहीं इस में सन्देह ही है । “मैं हजारों दुष्कर्म करूं- गा, उस पर कोई ख्याल न करना मैं जो कहूंगा वही करना,, । ऐसी बात किसी धर्म प्रवर्त्तक व्यक्ति के में शोभा नहीं देती। अवतार का प्रयोजन क्या ? इस पर अवतारवादी लोग कहते हैं कि मनुष्यों को शिक्षा मिलना ही अव- तार का प्रयोजन है। जिस कार्य्य से मनुष्यों को सुशिक्षा न हो कर कुशिक्षा होती ऐसे कार्य्यों को अवतार में आरोपण करना नितान्त असङ्गत है । चाहे जिस भाव से ही देखा जावे श्रीकृष्ण जी की बाल्यलीला को ऐतिहासिक घटना कह कर मानना बहुत कठिन है। बाल्य लीला में नानाप्रकार का आ- ध्यात्मिक वर्णन भी है। हम ने जो वेदाङ्ग—ज्योतिष के अनुसार रूपकवर्णन २