आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आर्य्यभटीयस्य- किया है। इसमे हमारा प्रयोजन यह है कि मनुष्य को सब विषयो में सत्य का अनुसन्धान करना चाहिये। यदि हमारे इस रूपक वर्णन में कोई भ्रान्ति सिद्ध हो तो उसे हम सादर स्वीकार करेंगे। श्रीकृष्ण वा श्रीरामचन्द्र आदि महापुरुषों के किसौ २ चरित में कोई २ अंश रूपकालङ्कार से वर्णन किये गये हैं ऐसा कहने से उन महात्माओं की सत्ता नष्ट नहीं होती अर्थात् ऐसा कोई न समझे कि इन महात्माओं ने जन्म ही नहीं ग्रहण किया केवल रूपक मात्र है। और उस में उन २ अवतारों के उपासकों के क्षोभ का कोई कारण नहीं। सर्वजन आराध्य आदिक के चरित में जो कई एक अर्थविहीन उपन्यास या कलङ्क आरोप किया जाया करता, वह निर्दोष, सार्थक, रूपक मात्र, और उस में अवतार आदि के चरित्र में कलङ्क स्पर्श न हो यही हमारे इस रूपकवर्णन का उद्देश्य है। अब हम आगे श्रीकृष्णलीला-का वर्णन करेंगे। श्रीकृष्ण-लीला। श्रीकृष्ण जी महाराज श्रीविष्णु भगवान् के अवतार कहे जाते हैं। वसुदेव और देवकी श्रीकृष्ण जी के पिता, माता, श्रीराधिका श्रीकृष्ण जी की प्रधाना भक्ति,-वृन्दावन, मथुरा, द्वारका और कुरुक्षेत्र, श्रीकृष्ण के लीलास्थल कहे जाते हैं असुरविनाश के लिये श्रीकृष्णजी का पृथिवी पर अवतार का उद्देश्य माना जाता है। श्री मद्भागवतपु० विष्णु पु० और ब्रह्म वैवर्त्त पुराणों में श्रीकृष्ण लीला वर्णित है। वैदिक आर्य्यों का परमदेव (१) सूर्य्य देव और वेदोक्त प्रमाण से सूर्य का दूसरा नाम विष्णु (२) है और विष्णु सूर्य्य का अधिष्ठात्री देवता (३) है। प्राचीन आर्य्यलोग प्रकृत वेदोक्त देव भिन्नअन्य देवी-उपासक थे ऐसा कदापि सम्भव नहीं। गोलकस्थ राशिचक्र में सूर्य्य देव का एक वर्ष परिभ्रमण, व्यापार उपलक्ष करके आर्य्य जाति के मनोरञ्जन के लिये पूर्व समय में श्रीकृष्ण लीला का अङ्कुर आरोपित हुआ किन्तु क्रमशः पुराणों में इस लीला रूपी वृक्ष की शा- खा प्रशाखा, पल्लव, होकर अब इस (लीलारूपी) वृक्ष में विषमय फल हो गये। (कुदरती प्राकृत राशि लीला का मर्म भूल कर श्रीकृष्ण महाराज जैसे आ- दर्श पुरुष वा पुरुषोत्तम के चरित्र में कलङ्क लगा) नहीं तो अधःपतन शील भारत भूमि में कुरुचि की धारा बहती हुई आदर्श पुरुष श्री कृष्ण जी की अतल स्पर्श कलङ्करूपी समुद्र में निमज्जित हो, उछलना डूबना क्यों पड़ता !!! (१)-गायत्र्युक्त सविता देव। (२)-ऋ० ८ । ७७ । १० ॥ऋग् १ । २२ । १६ ॥ (३)-गायत्री ॥