भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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भूमिका ॥ ९ 'चन्द्रविम्ब तारापति हुए। और लक्ष्मधारिणी ज्योत्स्नारूपिणी चन्द्रिमा (चान्दनी) लक्ष्मी देवी, विष्णुप्रिया या सूर्य-पत्नी हुयी। वैदिक प्राचीन प- द्धति और पौराणिक नवीन-पद्धति, दोनों ही की समानता हुयी। अब भी "ग्रीनलैण्ड" वासी इस्किमो जाति में यह विश्वास है कि सूर्य अपनी पत्नी चन्द्रिमा के पीछे २ युगयुगान्तर से दौड़ रहे हैं। किन्तु कभी च- न्द्रिमा को स्पर्श नहीं कर सके। और इन दोनों की यह क्रीड़ा उपलक्ष ही में पृथिवी पर दिन रात होते हैं। सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष शास्त्र में जो 'ग्रहण' के कारण दिखला ये गये हैं उस का स्थूल तात्पर्य यह है कि 'अयनवृत्त' परस्पर तिर्यक्भाव से अ- वस्थित है। चन्द्रमा के कक्षा वृत्त का एक अर्द्धांश अयन वृत्त के उत्तर में और अपर अर्द्धांश 'अयन वृत्त' के दक्षिण में अवस्थित और 'अयन मण्डल' और चन्द्रकक्षा के 'छेद विन्दुद्वय' को “पात” कहते हैं। इस पात के दोनों विन्दु की योग रेखा पर अमावास्या के अन्त में चन्द्र और सूर्य के अवस्थित होने से सूर्यग्रहण होता है। इस पातविन्दु-द्वय की योग रेखा के मध्यभाग में सूर्यविम्ब अवस्थित रहते हैं। इस 'योगरेखा' को "राहु" कल्पना करने से सूर्य विम्बरूप “सुदर्शन” (चक्र) द्वारा “राहु” दो खण्डित होता है। और पात के दो विन्दुओं में से एक को “राहु” और दूसरे विन्दु को “केतु” कहते हैं। या इन दोनों विन्दुओं को “राहु” और सांप की देह की नाईं पृथिवी छाया मध्ये चन्द्र प्रवेश करने से 'चन्द्रग्रहण' होता है ऐसा कहने में पृथिवी छाया को 'केतु' कहना अनुचित नहीं। ऐसा अर्थ करने पर समुद्र मन्थन में राहु का अमर होना और 'सुदर्शन' द्वारा राहु का शिर कटना, दोनों ही व्यापार सङ्गत और वेदाङ्गीभूत ज्योतिष शास्त्रानुमोदित होते हैं। समुद्रमथन-उपाख्यान में मेरु पर्वत, नारायणदेव, देव, असुर, अनन्तदेव, समुद्र, अमृत, कूर्म, इन्द्र, वासुकी, दूध, घृत, सुरभि, पारिजात-पुष्प, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, वारुणी, सोम, लक्ष्मी, हलाहल-विष, नीलकण्ठ, अमृतभाण्ड, अर्जुन, दिति अदिति और धन्वन्तरि आदि, शब्दों की व्याख्या कियी गयी है, परन्तु वेद, निघण्टु, ब्राह्मणग्रन्थ, १८ पुराण तथा वाल्मी- कीय आदि उल्लिखित-समुद्रमथन पर-विचार अलग पुस्तकाकार छपेगा- यहां विस्तार भय से-संक्षिप्त लिखा गया।