आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ गीतिकापादः ॥ धन करे । यह क्रिया उस समय तक करे जब तक अविशेष कर्ण लब्ध न हो अवशिष्ट मन्दकर्ण स्फुट होगा। वृत्तकर्म तो भुजज्या को ओजपद औ युग्मपद के वृत्त के अन्तर से गुणन कर व्यासार्द्ध से भाग देवे, भागफल ओज पद वृत्त में धन को ऋण करे । ओजपद वृत्त में धन को ऋण करे । औ ओजवृत्त में अन्य से न्यून द्वारा धन और अधिक में ऋण । वह स्फुट वृत्त होता है ॥ २४ ॥ भूताराग्रहविवरं व्यासार्धहृतस्स्वकर्णसंवर्गः । कक्ष्यायां ग्रहवेगो यो भवति स मन्दनीचोच्चे ॥२५॥ अन्त्योपान्त्यस्फुटकर्मसिद्धयोश्शीघ्रकर्णमन्दकर्णयोस्संवर्गो व्यासार्धहृतो भूताराग्रहविवरं भवति । भूमेस्ताराग्रहणाञ्चान्तरालं कलात्मकमित्युक्तं भवति । ताराग्रहाणां विक्षेपानयने भूताराग्रहविवरं भागहारो भवति । तत्र स्वपातो- नभुजज्यां स्वपरमविक्षिप्त्या निहत्य स्वेन भूताराग्रहविवरेण विभजेत् । तत्र लब्धं स्वविक्षेपो भवति । तत्रास्य विनियोगः कक्ष्यायामिति । अत्र प्रकाशि- काकारः । भूताराग्रहविवरव्यासार्धविरचितायां कक्ष्यायां यो ग्रहस्य जवस्सम- न्दनीचोच्चे भवति । तावत्प्रमाणायां कक्ष्यायां ग्रहो मन्दस्फुटगत्या गच्छती- त्यर्थः । इत्याह । अस्मान् किन्त्वेतन्नोपपन्नमिति प्रतिभाति । अथवा योजना । कक्ष्यावृत्ते स्फुटग्रहस्य मध्यादधि भवति । एवं शीघ्रेऽपीति । अथवा कक्ष्यायां गच्छतो ग्रहस्य प्रतिमण्डलतो बहिरन्तर्वा यावती परमा गतिस्तावत्प्रमाणव्या- सार्धं मन्दनीचोच्चवृत्तं भवति । एवं शीघ्रेऽपीति ॥ भा०:—तारा और ग्रहों के विक्षेप लाने में भूतारा ग्रह विवर भाग हार होता है । उसमें अपने पात से ऊन भुजज्या को स्वपरम विक्षिप्ति से अन्तर गुणन कर अपने भूतारा ग्रह से भाग देवे भागफल स्वविक्षेप होता है । कक्षा वृत्त में स्फुट ग्रह का मध्य से होता है । एवं शीघ्र में भी अथवा कक्षा में चले ग्रह का प्रति मण्डल से बाहर या भीतर जितनी परमागति होती है उतने परिमाण व्यासार्द्ध मन्दनीचोच्च वृत्त होता है । इसी प्रकार शीघ्र में भी जानना ॥ २५ ॥ इति पारमेश्वरिकायां भटदीपिकायां कालक्रियापादस्तृतीयः । ───::0::───