आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्यभटीये- ६९ तमुद्ग्गमनं षड्राश्यन्तरेऽपमण्डले चरतः। तस्मात् क्रमेण दक्षिणतश्चरतः। तत्रा- पे त्रिराश्यन्तरे परमविक्षेपसमं दक्षिणगमनम्। इति। एवं सर्वेषां विक्षेपम- ण्डलम् अपमण्डले स्वपातद्वयभागयोर्बद्धताभ्यां त्रिराश्यन्तरे उदग्दक्षिणतश्चापमण्ड- लात्परमविक्षेपान्तसितं भवति। परमविक्षेपस्तु शनिगुरुकुज खकगार्धं भृगुबुध ष इत्युक्तम्। (दशगीतिकायाम् ६।) केचिदाचार्या गुरुकुजशनीनां शीघ्रोच्चफलं स्वपातेऽपि ग्रहवत् कृत्वा तथाकृतं स्वपातं स्फुटग्रहाद्विशोध्य विक्षेपानयनं कुर्वन्ति बुधशुक्रयोस्तु स्वमन्दफलं स्वपाते कृत्वा तं पातं शीघ्रोच्चाद्विशोध्य विक्षेपं कुर्वन्ति। तथाच लल्लाचार्यः। "क्षितिसुतगुरुसूर्यसूनुपाताः स्वचलफलेन युता ग्रथा तथैव। शशिसुतसितयोः स्वपातभागाः स्वमृदुफलेन च संस्कृताः स्फुटाः स्युः॥" इति। अस्मिन् पक्षे कुजगुरुशनीनां स्फुटग्रहात्पातो नम्रं। इन्द्रादीनामर्क- क्षेपप्रकर्षसन्निकर्षकृतोदयास्तमयस्य परिज्ञानमाह। भा०:—स्फुट चन्द्रमा जब अपमण्डलस्थ पात सम होता है। तब क्रम से उत्तर ओर होकर जाता है। पात से तीन राशि के अन्तर पर परमविक्षेप सम-उत्तर गमन करता है। पात से ६ राशि के अन्तर पर स्थित चन्द्रमा अप- मण्डल में चलता है। उसी स्थान में दूसरे पात का सम्भव होता है। इस लिये उसकी स्थिति कही गयी। उस दूसरे पात से क्रमशः दक्षिण करके जाता है। वहां भी पात से तीन राशि के अन्तर पर परमविक्षेप सम दक्षिणायन होता है। एवं चन्द्राधार विक्षेपमण्डल का संस्थान कहा है। और परम विक्षेप ४ अंश ३० कला है (पा० ३। गी० ८) जिन राशियों का सम अप- यान होता उनकी निम्न लिखित चक्र द्वारा दिखलाया जाता है:— समअपयानचक्र ॥ ० जिन दो राशियों में सम अपयान होता। जिन दो राशियों में सम अपयान होता। राशि के | तुल्य || राशि के | तुल्य मेष | कन्या || तुला | मीन वृष | सिंह || वृश्चिक | कुम्भ मिथुन | कर्कट || धनु | मकर कर्कट | मिथुन || मकर | धनु सिंह | वृष || कुम्भ | वृश्चिक कन्या | मेष || मीन | तुला यह चक्र इसी पाद के दूसरी गी० के आशय से बना है।