आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ें७० गीतिकापादः ॥ भा०:—जिस प्रकार मन्दस्फुट चन्द्रमा स्वपात सम अपमण्डल में चलत है उसी प्रकार गुरु, कुज, और कोण स्वमन्दस्फुट पात सम अपमण्डल मे चलते हैं। तब क्रमशः उत्तर होकर जाता है। पात से तीन राशि के अन्तर पर मन्दस्फुट में परमविक्षेपसम उत्तर गमन करता है। पात से ६ राशि के अन्तर पर मन्दस्फुट अपमण्डल में चलते हैं। तब क्रम से दक्षिण से जाते हैं। वहां भी तीन राशि के अन्तर पर परम विक्षेप सम दक्षिण को जाता है। एवं गुरु, कुज, मन्द के आविर्भूत विक्षेपमण्डल का संस्थान है बुध और शुक्र के स्वमन्दफल को अपने शीघ्रोच्च में व्यस्त (उलटा) करके उससे अपने पात को घटाकर विक्षेप साधे। इसलिये मन्दफल संस्कृत शीघ्रोच्च स्वपात सम अपमण्डल में चलते हैं; तब क्रम से उत्तर जाते हुए पात से तीन राशि के अन्तर पर शीघ्रोच्च में परम विक्षेपसम उत्तर गमन छः राशि अन्तर पर अपमण्डल में चलने से। तब क्रम से दक्षिण जाते हुए वहां भी राशि के अ- न्तर पर परमविक्षेप सम दक्षिण गमन करतां है। इसीप्रकार सब का वि- क्षेपमण्डल अपमण्डल में स्वपात के दोनों भाग में बन्धा उन दोनों से तीन राशि के अन्तर पर उत्तर दक्षिण करके अपमण्डल से परम विक्षेपान्तमित होता है ॥ ३ ॥ चन्द्रोऽशैर्द्वादशभिर्विक्षिप्तोऽर्कात्तरस्थितैर्दृश्यः । नवभिर्भृगुर्भृगोस्तैर्द्वयधिकैर्द्वयधिकैर्यथाश्लक्ष्णाः ॥४॥ अविक्षिप्तो मृगाङ्कस्स्वार्कान्तरस्थितैर्द्वादशभिरंशैर्दृश्यः । (नवभिर्भृगुः । न वभिः कालांशैर्भृगुर्दृश्यः )। नवभिर्विनाडिकाभिरित्यर्थः । भृगोस्तैस्तैर्द्वयधि कैर्गुरुर्दृश्यः । एकादशभिः कालभागैरित्यर्थः । तैर्द्वयधिकैर्बुधो दृश्यः । त्रयोद शभिः कालभागैरित्यर्थः । तैर्द्वयधिकैश्शनिर्दृश्यः । पञ्चदशभिः कालभागैरि- र्थः । तैर्द्वयधिकैः कुजोदृश्यः सप्तदशभिः कालभागैरित्यर्थः । यथाश्लक्ष्णाः । थासूक्ष्मा इत्यर्थः । शुक्राद्गुरुस्सूक्ष्मः । ततो बुधः । ततो मन्दः । ततः कुजः । * गुरुबुधशनिभौमाशशिशिङअपानमांश्का इति (दशगीतिकायाम् ५ ।) ह्यदशात्र श्लोक्तः । विक्षिप्ते ग्रहे तु दर्शनसंस्कारयुतग्रहसूर्ययोरन्तरालग तैरंशैर्यथोक्तसं र्दृश्यो भवति । स्वतोप्रकाशस्य भूम्यादेः प्रकाशहेतुमाह । भा०:—सूर्य्य से १२ अंश दूर पर चन्द्रमा दृश्य होता है, ९ नौ काल अर्थात् विनाडिका से शुक्र दृश्य होता है, गुरु ११ कालांश, बुध १३ काल