आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्यभटीये- ७३ वं ताराणां मिथ्याज्ञानवशादुत्पन्नां प्रत्यग्गमनप्रतीतिमङ्गीकृत्य भूमेः प्राग्ग- तैरभिधीयते । परमार्थतस्तु स्थिरैव भूमिरित्यर्थः । भपञ्जरस्य भ्रमणहेतुमाह । भा०:-जैसे नौका में बैठा हुआ मनुष्य किनारे की स्थिर वस्तुओं को दू- सरी ओर को चलते हुए देखता है, ऐसे ही मनुष्यों को सूर्य्यादि नक्षत्र जो स्थिर हैं, पश्चिम की ओर चलते हुए दीखते हैं और पृथिवी स्थिर मालूम होती है, परन्तु वास्तव में भूमि ही चलती है ॥ ९ ॥ उदयास्तमयनिमित्तं नित्यं प्रवहेण वायुनाक्षिप्तः । लंकासमपश्चिमगो भपञ्जरस्सहग्रहो भ्रमति ॥१०॥ रव्यादीनामुदयास्तमयहेतुभूतो भपञ्जरो नक्षत्रगोलो राशिश्चक्रात्मकः प्रव- हाख्येन वायुना सदा आक्षिप्तो लङ्कायां समपश्चिमो ग्रहैस्सह भ्रमति । मेरु- मानं तत्स्वरूपञ्चाह । भा०:-सूर्य्यादि के उदय और अस्त के हेतु भूत भपञ्जर अर्थात् नक्षत्रगोल प्रवह नामक वायु द्वारा सदा आक्षिप्त लङ्का में सम पश्चिम ग्रहों के साथ चलता है ॥ १० ॥ मेरुर्योजनमात्रः प्रभाकरो हिमवता परिक्षिप्तः । नन्दनवनस्य मध्ये रत्नमयस्सर्वतोवृत्तः ॥११॥ मेरुर्योजनमात्रोच्छ्रितस्तावद्विस्तृतश्च । सर्वतोवृत्तो रत्नमयत्वात्प्रभाकरश्च प्रभाशामाकरः । हिमवता पर्वतेन परिक्षिप्तो नन्दनवनस्य मध्ये भवति । भू- मेरुर्ध्वमधश्च निर्गतो मेरुरित्याह । तथाच मयः । ( सूर्यसिद्धान्ते भूगोला- ध्याये श्लो० ३२—३४ । ) “मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ॥ तदन्तरपुटास्सप्त नागासुरसमाश्रयाः । दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ॥ अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुरुभयत्र विनिर्गतः ॥” इति ॥ मेरुबडवामुखाद्यवस्थानप्रदेशमाह । भा०:-मेरु योजनमात्र ऊंचा है और योजनमात्र विस्तृत है, सब ओर से घिरा हुआ रत्नमय होने से प्रकाशवान् है । हिमवान् पर्वत से परिक्षिप्त नन्दन . वन के बीच में अवस्थित है ॥ जैसा कि सूर्य्यसिद्धान्त में लिखा है:—ब्रह्मा की १०