आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्यभटीये- ८१ तत उपर्याकृष्य प्रत्यङ्मुखं तेनैव नीत्वा तदग्रबद्धं पारतपूर्णमलावु जलपूर्णे न- लके निदध्यात् ततो नलकस्याधश्छिद्रं विवृतं कुर्यात् तेन जलं निस्स्रवति। न- लकस्थजलमधो गच्छति। तद्दशाच्च तत्रस्थमलाबु पारतपूर्त्या गुरुत्वाज्जलेन स- हार्धो गच्छद् गोलं प्रत्यङ्मुखमाकर्षति। एवं त्रिंशद्घटिकाभिरर्धसम्मितं यथा जलं भवति गोलस्य चार्थे भ्रमति तथा स्वबुद्धया जलनिस्स्रावो योज्यः । इति । गोलोऽयं घटिकायन्त्रात् कालपरिच्छेदसाधनमेव नतु (ज्योतिश्चक्रभ्रमणसाधनम्) ज्योतिश्चक्रे हि समोदितौ गुरुचन्द्रौ प्रतिमुहूर्त्तं स्थानान्तरितौ दृश्येते । अस्मिन्न तन्ना दृश्येते । अतो घटिकायन्त्रसमोऽयं गोलः। नतु ज्यतिश्चक्रसमः । क्रान्ति भूज्यार्काग्राशङ्कुशङ्क्वग्रसमशङ्कादीनामुपपत्तिज्ञानं हि गोलप्रयोजनम् ॥ अथ ज्योतिश्चक्रस्थैर्ज्याधैः क्षेत्रविशेषान् प्रदर्शयिष्यन् क्षेत्रकल्पनाप्रकारमक्षावल- म्बकौ चाह । भा०:-वंश आदि काष्ठ का बन्द् डुंग्रा सब ओर से बराबर एवं सम गुरु ( भारी ) वृत्त (हल्का और बहुत भारी नहीं ) इस प्रकार काष्ठगोल बनाकर पारे से या अपनी बुद्धि से विचार कर किसी अन्य उपयुक्त वस्तु से काल के बराबर भ्रमण करावे । इस का अभिप्राय यह है कि-भूपृष्ठ के दक्षिण उत्तर स्तम्भ के ऊपर गोल प्रोत लोहे के शलाके के आगे में स्थिर करे । गोल के द- क्षिणोत्तर छिद्र में तैल से इस प्रकार सींचे जिस से निस्सङ्ग होकर भ्रमण करे । गोल के दूसरी ओर से परिधि सम्मित दीर्घ छिद्र के साथ जल से भरा नलक ( नल ) रक्खे, तदनन्तर गोल के अपर स्वस्तिक पर कीलक गाड़े,-एवं उस सूत्र के एक अग्रभाग को बांध कर, विषवन्मण्डल पृष्ठ द्वारा प्राङ्मुख लाकर ऊपर को खींच कर उसी से प्रत्यङ्मुख लाकर उस को अग्रभाग को बांधकर, पारे से भरी तुम्बी जल भरे हुए नलक में रक्खे, तब नलक के नीचे के छिद्र को फैलावे-उस से जल गिरता है । और नलक में जल नीचे जाता है, इस कारण वहां की तुम्बी पारे से भरे होने से भारीपन से जल के साथ नीचे जाती हुई गोल को पूर्व की ओर खींचती है । एवं ३० घटिका में आधे भाग गोल जितने जल में से गिरे उतना जल गिरने योग्य अपनी बुद्धि से रक्खे ॥२२॥ दृग्गोलार्धकपाले ज्यार्धेन विकल्पयेद्गोलार्धम् । विषुवज्जीवाक्षभुजा तस्यास्त्ववलम्बकः कोटिः ॥२३॥ दृग्गोलार्धकपाले दृश्ये गोलार्धभागे ज्यार्धेन तत्र गोलपादनिष्पन्नेन ज्या- र्थेनाक्षादिभुजात्मनावलम्बकादिकोट्यात्मना च स्थितेन भगोलार्धं विकल्पये- ११