आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आर्य्यभटीयस्य- में सिंह राशिस्य पञ्च तारकामय मघा नक्षत्र है और इस की अधिष्ठात्री देवता 'यम' हैं सुतरां मघा की ज्योतिः नव प्रसूत बालक का जीवन संहा- रक "ग्रहि" पूतना नामक बाल रोग का उत्पादक यही मघा (१) पूतना है। मघा की योगतारा (२) देवकी के (अयन रेखाद्धृ) उपरिस्थ कहने से पूतना को मातृ पद में अभिषिक्त कर श्रीकृष्ण को स्तन्य देने में व्यापृत कियी गयी है। सूर्य्य देव के मघा में अवस्थिति काल में मघा आच्छादित होता है। श्रीकृष्ण ने मघा संहार कर पूतना को विनाश किया। सामने सिंहराशिस्य पूर्व्वएवं उत्तर दोनों फल्गुनी वा अर्जुनी नक्षत्र (३) इन दो नक्षत्रों को अतिक्रम कर श्रीकृष्ण ने "यमलार्जुन वृत्त" भञ्जन लीला दिखलाया है। सम्मुख में कन्या राशिस्य हस्त, चित्रा, तुला राशिस्य स्वाती, विशाखा, वृश्चिक राशिस्य अनुराधा, ज्येष्ठा, और धनु राशिस्य मूल, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ ये नव नक्षत्र हैं। ये ही आधुनिक पौराणिक नव नारी हैं (४) आठ सखी और आद्यशक्ति विशाखा या राधा (५) विशाखा की आकृति पुष्पमाला या तोरण की नाईं या हिस्रन कीसी है। और विशाखा की अधिष्ठात्री देवता 'शक्राग्नी, या 'वि- द्युत्' है। इस विद्युताग्नि का नाम यही 'र' (६) अग्नि का आधार कह कर वि- शाखा 'राधा' नाम से विख्यात (७) है। श्रीकृष्ण, चन्द्रावलि, चित्रलेखा, ललिता (८) इन तीन सखियों के साथ सम्भाषण कर श्री राधा के घर में आकर देखा कि अयन रेखा को (९) श्रीराधा ने अधिकार किया है। श्रीकृष्ण और श्रीराधा का मिलन हुआ। यह श्री राधा कौन हैं? वृषराशिस्य सूर्य्य देव "वृषभानु" राजा। 'कलावती, चन्द्रिमा उन की पत्नी हैं। कलावती अपने पति वृष (राशिस्य सूर्य्य) भानु (राजा) से मिलने की आशा में उन्मत्ता होकर पूर्णाकृति लाभ के (१) Regulus (२) मघा को पूतना कहने का और भी कारण है मघा की आकृति हूल की सी है, और देखने में ध्वजा Flag की नाईं मालूम पडता है इस कारण मघा को "ध्वजिनी,, कहना सार्थक है। और "ध्वजिनो वाहिनी सेना,, पूतनाऽनीकिनी चमूः,, इत्यमरः। इस अमरकोश प्रमाण से पाया जाता है कि पूतना शब्द ध्व जिनी के अर्थ में व्यवहार करने योग्य है और मघा पूतना दोनों ही ध्वजिनी, कहने से मघा पूतना और पूतना को श्रीकृष्ण जी के मातृस्थान में विठालाने के अनेक कारण हैं। जैसे तृतीये दिवसे मासे (वर्षे वा गृह्णाति) "पूतना नाम मातृका,, इति चक्रपाणिदत्त । श्रीकृष्ण जी को पूतना के स्तन्य देने का और भी कारण है जैसे भावप्रकाश (वैद्यक) में यह पूतना "बाल रोग चिकित्सायम् तत्र संशोधने पूर्व धात्री स्तन्यं विशोधयेत् ,,॥ (३) ऋक् १० । ८५ । १३ ॥ (४) चन्द्रावलि, चित्रलेखा ललिता विशाखा तुङ्ग विद्या रंग देवी चम्पकलता सुदेवी और इन्दु लेखा ये ८ हैं। (५) "राधा विशाखा पुष्येतु,, इत्यमरः (६) "स्मृते रः, पावके तीक्ष्णे,, इति मेदिनी (७) "वैशाखे माधवोराधः इत्यमरः (८) स्वाती नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवता 'पवन, और स्वाती तुला राशि में अवस्थित होने से इस का नाम 'ललिता, है। और हस्ता का पांच तारा चन्द्र तुल्य शुक वर्ण है (९) अयन घोष या रासण घोष॥