आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ १३ लिये ज्येष्ठा नक्षत्राभिमुख यात्रा काल में कमलाकृति विशाखा के बीच वि- द्युत रूप राधा को प्राप्ति हुई । इस स्थान में राधा का पौराणिक जन्म और लालन पालन आदि पाठक स्मरण करें । श्रीकृष्ण का, तुलाराशि में राधा नक्षत्र भोगकाल में आकाशाग्नि (सूर्य) अन्तरिक्ष अग्नि में (विजुली में) मिलन हुआ । (१) सांख्य शास्त्रोक्त प्रकृति पुरुष का मिलन हुआ । क्रमशः कार्त्तिकी पौर्णमासी आयी विद्यतमयी षट् कृत्तिका की शोभा में पौर्णमासी की रौपमय' ज्योत्स्ना घर्षित हुयी । का- र्त्तिकी पौर्णमासी की कौमुदी ज्योत्स्ना में जगत् भासित और हासित होने लगा । पशु, पक्षी आदि सब जीवगण और जगत् जन प्रह्लाद मे पुलकित हुए । जगत् जन इस विमुग्ध कर रजनी को नृत्य, गीत, द्वारा सुख से व्यतीत करने लगे । यह विचित्र नहीं । इसी जगत् मय नृत्य, गीत, का नाम 'रास- लीला' (२) है । श्रीकृष्णदेव श्रीराधा और आल सखी मिल कर रासलीला में स्थान वृन्दावन में प्रमत्त हुए । आज पौर्णमासी कलावती और मातृका- गण (३) (षटकृत्तिका) अपनी कन्या राधा के शुभगृह में उन्मत्ता हुयी । विमान पर पुरन्ध्रीगण, आज अट्टहास करती हैं । प्रकृति की इस अनुपम शोभा में संसार मुग्ध हो रहा है । यह 'वृन्दावन' कहां ? यह देखो 'गोलोक' में लाखोलाख गोप । (४) गोपी अर्थात् तारक तारका परिवेष्टित हो धाता, इन्द्र, सविता इत्यादि द्वादश आदित्य (५) रूप में श्रीदामनु, सुदामन, प्रभृति' द्वादश गोप मण्डल के साथ श्रीसूर्यदेव, श्रीकृष्ण' नाम से वृन्दावन में रासलीला में विराज- मान (६) हैं। यदि इस प्राकृतिक रासलीला सुदर्शन से आप के हृदय में गम्भीर विमल ईश्वर के प्रेम का उदय हो कर मन, प्राण, पुलकित न हो और कलुषित भौतिक प्रेमभाव यदि किसी के क्षुद्र कुसंस्कार तिमिराच्छन्न हृदय में प्रवेश करता हो तब हम और क्या कहेंगे, हां इतना तो अवश्य कहेंगे कि भाइयो !, श्रीकृष्णभगवान् में चाहे ईश्वरभाव से अपनी रुचि अनुसार पूजा करो परन्तु ऐसे पुरुषोत्तम आदर्श पुरुष के सचुरित्र में पापमय लीला चित्रित आपे को कलङ्कित न करो और नारकी न बनो ! ! ! हमने पुनर्वसु नक्षत्र से राधा नक्षत्र तक आदित्यदेव' (श्रीकृष्ण) का (१)—ऋक् १ । ६५ । १० ॥ (२)—गुणेरागेन्द्रव रसः । इत्यमरः । (३)—षट् कृत्तिका । (४)—गो—का अर्थ किरण ऋक् १ । ६२ । ५ प-पालने (५)—वैशाख से चैत्र पर्यन्त सूर्य के नाम १ धाता, २ इन्द्र, ३ सविता, ४ विवस्वान्, ५ भग, ६ अर्यमन्, ७ भास्कर, ८ मित्र, ९ विष्णु, १० वरुण, ११ पूषा और १२ अंश है। महाभारत आदि पर्व ॥ (६) ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के ४ थे अध्याय ।