आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आर्य्यभटीयस्य - अनुसरण कर रासलीला का बोध कराया परन्तु इस से लीला का सम्यक् बोध न हुआ है। क्योंकि बलदेव, नन्दगोप, यशोदा देवी और रोहिणी देवी इन के न होने से रासलीला का आरम्भ नहीं हो सकता। अन्य ग्रह की तरह आदित्य देव की क्रूरगति (१) नहीं होती, सुतरां नन्दराज के भवन में श्रीकृष्ण को ले कर जाने के लिये उपाय रहित (२) इस कारण इस समय बलदेव आदि को नन्दालय से रामलीला में निमन्त्रण कर, लाना पड़ा। बहुत पर्यटन से प्रयोजन नहीं। यह देखो एकवार, राशिचक्र में दृष्टि डालकर देखो कलावती चन्द्रमा के पश्चात् भाग में वृषवीथि में। (३) वृषराशि में यशोदादेवी (४) और रोहिणी देवी (Aldebaran in Hyades) विराजती हैं। वृषराशिश्च सूर्य्य इन्द्र देव (५) देवराज सखा नन्दराज जहां? "यात्यमित्र नाहि तस्य दूरम्" सुतरां हम ने आपलत नन्दराज को वृषराशि में व्यापन किया। विचार पीछे होगा। यथा स्थान में विष्णुपुराण के ५म अंश में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त वर्णित नहीं है। यथा स्थान में श्रीमद्भागवत के दशमस्कन्ध में ऋषिवाक्य में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त का विवरण प्रकाशित नहीं। यथा स्थान में ब्रह्मवैवर्त्त पु० के जन्मखण्ड में संघर्षण देव (६) का जन्मवृत्तान्त विस्तृत है। किन्तु एकवार इसी के साथ बुध-जन्म वृत्तान्त स्मरण करो (७) चतुर्थ वसुदेव पुत्र संघर्षण रोहिणी गर्भजात कह कर 'रौहिणेय हैं' किन्तु 'देवकी- नन्दन' या 'वसुदेवनन्दन' नाम क्यों नहीं पाया? तृतीय वसुदेव (८) पुत्र बुध ने सौम्य' नाम पाया किन्तु 'तारकानन्दन' या तारासुत' नाम क्यों नहीं पाया? दोनों ही का जन्म वृत्तान्त रूपक मूलक है। हम लोग ज्योतिष- शास्त्र में बुध की आधिप्रक्रिया घटना में पाते हैं कि, बुध "रौहिणेय हे।"। पुराण में रूपक बिगड़ने के भय से इस का इतिहास नहीं लिखा गया कि किस कारण से बुध का 'रौहिणेय' नाम पड़ा। (१)-Retrograde motion (२)-राशि चक्र में आदित्य देव मेष राशि से क्रमशः पूर्वदिशा में वृष आदि द्वादश राशि एक वर्ष में परिभ्रमण करते हैं। वृष राशि में नन्दालय मिथुन राशिरथ पुनर्वसु नक्षत्र के पश्चिम में वृष राशि अवस्थित सुतरां राशि चक्र पर्यटन न करने से श्रीकृष्ण वृष राशि में किस प्रकार जायगे ॥ (३)-वृष राशि के पूर्व और पश्चिम सीमान्त में स्थित दो ध्रुवक रेखा के मध्यवर्त्ता गोलकांश को वृषवीथि कहते हैं। (४)-वृष राशिरथ पाटलवर्ण देवमातृका षोडश मातृका में देव सेना या षष्ठी नाम से ख्यात एव ताम् वदन्ति महा षष्ठी पण्डिताः शिशुपालिकाम्। देवमातृका ने श्रीकृष्णलीला में यशोदा नाम पाया है ज्योतिष्मन्तां कहने से यशोभि धवलता ॥ (५)-त्रयैष्टमन्वे भवेदिन्द्रः इतिकौर्मे १८ अध्यायः ॥ (६)-देवक्याः सप्तमे गर्भे कंसो रचो दधौ भिया। रोहिणी जठरे माया तमा कृत्य ररक्ष च ॥ तस्माद् बभूव भगवान् नाम्ना संघर्षणः प्रभुः। (७)-तारका गर्भे सम्भूत स एव च बुधः स्वयम्। ब्रह्मवै०पु०ब्र०खण्डे६६अ० ॥ (८)-धरो ध्रुवश्च सोमश्च विष्णुरनिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ क्रमात् स्मृताः ॥ गदा वरद खड्गिण इते ग्रह-योग तत्त्वे।