अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
छाया रूप होने से उसी के अन्तर्गत जानो ॥
चार वेदों की ११३१ शाखा, प्रत्येक शाखा के साथ ११३१ ब्राह्मण ग्रन्थ, कल्पवेदाङ्ग के ११३१ श्रौत सूत्र, तथा ११३१ गृह्यसूत्र, ४ वेदों की चार शिक्षा, एक व्याकरण, एक निरुक्त, एक छन्दः, एक ज्योतिष, बीश २० धर्म शास्त्र, ६ मीमांसा, चार ४ न्याय, बीश २० इतिहास पुराण, ये सब कम से कम सनातन धर्म तथा विद्या के भण्डार ४५१८ चार हजार पांच सौ अठहत्तर विद्या धर्म के पुस्तक पूर्वकाल में विद्यमान थे । इन से भिन्न उपपुराणादि अन्य भी ग्रन्थ बाकी रहते हैं। उपपुराणादि का पुराणों में अन्तर्भाव हो सकेगा । परन्तु मुख्य कर यही चौदह प्रकार की विद्या प्राणी को संसार समुद्र से पार करने वाली है । उपनिषद् पुस्तक, शाखा तथा ब्राह्मणों के अन्तर्गत आजाने से पृथक् नहीं गिनाये गये हैं । तथा उस २ वेद के उपनिषद् भी उसी २ वेद के अन्तर्गत माने जाते हैं । उपवेद पुस्तकों का धर्मके साथ विशेष सम्बन्ध न होने पर भी विद्या पुस्तक अवश्य माने जायेंगे । पर उन का अपने २ वेद के साथ अन्तर्भाव हो जाने से चार वेदों में आ सकते हैं इस से पृथक् नहीं गिनाये गये हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति अ० १ ।
मन्वत्रिविष्णुहारीत याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ।
यमापस्तम्बसंवर्त्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ ४ ॥
पराशरव्यासशंख लिखितादक्षगौतमौ ।
शातातपोवासिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥ ५ ॥
भाषार्थ—मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप, और वसिष्ठ, ये बीश महर्षि वा आचार्य धर्मशास्त्रों के प्रवर्त्तक वा बनाने वाले हैं । अर्थात् मनुआदि के नाम से बीश धर्मशास्त्र प्रधान वा मुख्य हैं । इन में से कई ऋषियों के नाम से लघु बृहत् दो २ पुस्तक बने हुए मिलते हैं। सो अनुमान होता है कि काल क्रम से एक ही महर्षि के उपदेश को उन २ के शिष्यादि लोगों ने धर्म शास्त्र पढ़ने वालों का थोड़ा पढ़ने से काम चल सके इत्यादि प्रयोजन से समय २ पर भिन्न २ आवश्यकता देख समझ कर दो २ भाग किये होंगे। परन्तु इन धर्मशास्त्रों में कोई २ (वृद्धहारीत ) पुस्तक बृहत् नाम से ऐसा भी है कि जिसको स्मृति वा धर्मशास्त्र ही नहीं कह सकते। क्योंकि लोकव्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्रों का विषय है । और स्मृतियों के जो २ विषय लोक व्यवहार के नियमार्थ महर्षियों ने रक्खे हैं वे सब पाठक महाशयों को अष्टादशस्मृतियों के सूचीपत्र से ज्ञात