अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ३
हो ही जायंगे । अर्थात् संप्रदायी कृत्यों का आग्रह करना बीश में से किसी भी स्मृति में जब नहीं आया तो वृद्धहारीतादि में केवल वैष्णव संप्रदाय के शंख चक्रादि संस्कारों का सब के लिये आग्रह करना स्मृति का विषय कैसे होगा ? । अर्थात् कदापि नहीं । हमारा अनुमान है कि ऐसी स्मृति महर्षि हारीत की कही हुई नहीं है किन्तु किसी वैष्णव सम्प्रदायी विद्वान् ने अपने मत के प्रचारार्थ महर्षि हारीत के नाम से बना दी है । इससे हमारा प्रयोजन किसी सम्प्रदाय को बुरा कहने वा खण्डन करने का नहीं है । किन्तु प्रयोजन इतना ही है कि सम्प्रदाय के चिन्हादि का आग्रह करना स्मृति का विषय कदापि सिद्ध नहीं होता । इससे उनको स्मृति नहीं कह सकते क्योंकि उससे लोक व्यवहार की कुछ भी व्यवस्था नहीं होती है । तथा शंख चक्रादि चिन्ह धारण किये बिना पूर्ण भक्ति से पूजा उपासना करनेवाले पर विष्णु भगवान् प्रसन्न न हों यह भी समझ में नहीं आता । इस से हम इतना ही कहना उचित समझते हैं कि जिनके यहां कुल परम्परा से जो सम्प्रदाय चला आता है उन्हीं के लिये वह ग्राह्य है । उसी सम्प्रदाय के नियमानुसार वे लोग श्रद्धाभक्ति से देवाराधन करें, यही सनातन धर्मका मूल है । किन्तु यह न कहें वा मानें कि जो ऊर्ध्व पुण्ड्र वा शंख चक्रादि धारण न करें वे चाण्डाल वा नीच हैं ।
अब एक बात यह भी विचारणीय है कि याज्ञवल्क्य स्मृति के ऊपर लिखे दो श्लोकों में स्मृतियों के २० ही होनेका कोई नियम नहीं कियागया किन्तु ऊपर लिखे याज्ञवल्क्य के दो श्लोकों में मुख्यकर धर्मशास्त्र कर्त्ताओं के नाम दिखाये हैं कि ये स्मृतिकारों में प्रधान हैं । यह अभिप्राय नहीं है कि ये ही स्मृतिकार हैं इनसे भिन्न कोई भी धर्मशास्त्र कर्त्ता नहीं है । इस से पुलस्त्य, बौधायन, देवलादि की स्मृतियों को भी धर्मशास्त्र मानना चाहिये ।
इन ऊपर लिखी २० स्मृतियों में भी मनु और याज्ञवल्क्य स्मृति विशेष मान्य तथा प्रतिष्ठित हैं । इसी कारण इस अष्टादशस्मृतियों के संग्रह में उक्त दोनों स्मृति नहीं रक्खी गयीं हैं। हम इन स्मृतियों के बाद में ही मनु, याज्ञवल्क्य, बौधायनादि कई उपयोगी स्मृतियां शीघ्र छपाने की इच्छा रखते हैं। जिसको श्रीकृष्ण भगवान् पूरी करेंगे ऐसी आशा है ।
इन अठारह स्मृतियों में एक से ही कई विषय आये हैं। जिनको बार२ आये देखकर पाठक महाशय पुनरुक्त दोष ग्रस्त न समझें क्योंकि एक ऋषिकेकथन में एक विषय वार २ होने से पुनरुक्त कह सकते थे। पूर्वकाल में जब छापेखानों