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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ३

हो ही जायंगे । अर्थात् संप्रदायी कृत्यों का आग्रह करना बीश में से किसी भी स्मृति में जब नहीं आया तो वृद्धहारीतादि में केवल वैष्णव संप्रदाय के शंख चक्रादि संस्कारों का सब के लिये आग्रह करना स्मृति का विषय कैसे होगा ? । अर्थात् कदापि नहीं । हमारा अनुमान है कि ऐसी स्मृति महर्षि हारीत की कही हुई नहीं है किन्तु किसी वैष्णव सम्प्रदायी विद्वान् ने अपने मत के प्रचारार्थ महर्षि हारीत के नाम से बना दी है । इससे हमारा प्रयोजन किसी सम्प्रदाय को बुरा कहने वा खण्डन करने का नहीं है । किन्तु प्रयोजन इतना ही है कि सम्प्रदाय के चिन्हादि का आग्रह करना स्मृति का विषय कदापि सिद्ध नहीं होता । इससे उनको स्मृति नहीं कह सकते क्योंकि उससे लोक व्यवहार की कुछ भी व्यवस्था नहीं होती है । तथा शंख चक्रादि चिन्ह धारण किये बिना पूर्ण भक्ति से पूजा उपासना करनेवाले पर विष्णु भगवान् प्रसन्न न हों यह भी समझ में नहीं आता । इस से हम इतना ही कहना उचित समझते हैं कि जिनके यहां कुल परम्परा से जो सम्प्रदाय चला आता है उन्हीं के लिये वह ग्राह्य है । उसी सम्प्रदाय के नियमानुसार वे लोग श्रद्धाभक्ति से देवाराधन करें, यही सनातन धर्मका मूल है । किन्तु यह न कहें वा मानें कि जो ऊर्ध्व पुण्ड्र वा शंख चक्रादि धारण न करें वे चाण्डाल वा नीच हैं ।

अब एक बात यह भी विचारणीय है कि याज्ञवल्क्य स्मृति के ऊपर लिखे दो श्लोकों में स्मृतियों के २० ही होनेका कोई नियम नहीं कियागया किन्तु ऊपर लिखे याज्ञवल्क्य के दो श्लोकों में मुख्यकर धर्मशास्त्र कर्त्ताओं के नाम दिखाये हैं कि ये स्मृतिकारों में प्रधान हैं । यह अभिप्राय नहीं है कि ये ही स्मृतिकार हैं इनसे भिन्न कोई भी धर्मशास्त्र कर्त्ता नहीं है । इस से पुलस्त्य, बौधायन, देवलादि की स्मृतियों को भी धर्मशास्त्र मानना चाहिये ।

इन ऊपर लिखी २० स्मृतियों में भी मनु और याज्ञवल्क्य स्मृति विशेष मान्य तथा प्रतिष्ठित हैं । इसी कारण इस अष्टादशस्मृतियों के संग्रह में उक्त दोनों स्मृति नहीं रक्खी गयीं हैं। हम इन स्मृतियों के बाद में ही मनु, याज्ञवल्क्य, बौधायनादि कई उपयोगी स्मृतियां शीघ्र छपाने की इच्छा रखते हैं। जिसको श्रीकृष्ण भगवान् पूरी करेंगे ऐसी आशा है ।

इन अठारह स्मृतियों में एक से ही कई विषय आये हैं। जिनको बार२ आये देखकर पाठक महाशय पुनरुक्त दोष ग्रस्त न समझें क्योंकि एक ऋषिकेकथन में एक विषय वार २ होने से पुनरुक्त कह सकते थे। पूर्वकाल में जब छापेखानों

४ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥

का प्रचार नहीं था तब अपने२ कुल गोत्र के महर्षि ने कहे अपने२ धर्मशास्त्र को भिन्न२ प्रान्तों में रहने वाले ब्राह्मणादि लोग पढ़ते पढ़ाते थे। अब जैसे२ छापे खाने बढ़े वैसे२ सब पुस्तक सर्वत्र फैलने लगे हैं। परन्तु पूर्वकाल के तुल्य सामयिक ब्राह्मणादि द्विज लोग धर्मशास्त्रों के जानकार अब नहीं हैं। हम अपने पाठकों से सानुनय प्रार्थना करते हैं कि आप लोग कई बार इन धर्मशास्त्रों को ध्यान देकर अवश्य पढ़ जाइये। तो आप को बड़ा लाभ होगा सो आप स्वयमेव पीछे जान लोगे।

परन्तु धर्मशास्त्रों का पाठ करने से पहिले निम्न लिखित विचारों को अवश्य ध्यान में रख लेना।

१—जहां लिखा हो कि ऐसा काम करने से अमुक २ उत्तम अदृष्ट फल होता है। तब आपको समयानुसार यदि सन्देह हो कि ऐसा फल होगा इस में प्रमाण ( सबूत ) क्या है ? तब शोच लेना कि—किसी ने कहा कि नदी के किनारे फल हैं जाकर लेआओ। इस शब्दप्रमाण पर अन्य प्रमाण की हुज्जत करने वाला न तो नदी तक जायगा और न उस को वे फल मिलेंगे। कर्म का फल उस के अन्त में होता है।

२—यह भी ध्यान रहे कि धर्मशास्त्रादि पुस्तक अधिक वा अपरिमित देशकालों में होने वाले असंख्य प्राणियों के लिये हैं। इन में लिखे विचार प्रत्येक देश वा काल में प्रत्येक प्राणी के लिये उपकारी नहीं हो सकते हैं। जैसे पंसारी की दुकान में तिक्त, कटु, मिष्ट और विष आदि भी रहते हैं। उनमें से कभी किसी को विष भी अमृत का सा काम देता और कभी जीवन का आधार अन्न भी विष के तुल्य मनुष्य को मार डालता है ( अजीर्णे भोजनं विषम् )। इस लिये जो अंश आप को अपने उपयोगी न जान पड़ें उन के लिये हुज्जत न मचाइये। पंसारी की दुकान पर कुछ प्रयोजनीय वस्तु लेने को गया हुआ मनुष्य विषादि के लिये झगड़ा करने लगे कि तुम ने यह दूकान में रक्खा हीं क्यों ? । तो उस का समय झगड़े में ही चला जायगा किन्तु प्रयोजनीय वस्तु लेने से भी वंचित रहेगा। इसी के अनुसार, मांसादि प्रतिकूल विषयों पर झगड़ा छोड़ के अपने कल्याणार्थ किन्हीं उत्तम अंशों पर चित्त लगा के तद्नुसार आचार विचार सुधार के अपना कल्याण कीजिये। अन्यथा यही कहावत सिद्ध होगी कि (आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास)

३—धर्मशास्त्रों में बार २ लिखी विशेष उपयोगी बातों को बार २ देखिये तो कण्ठस्थ हो जाने से विशेष लाभ होगा।

अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ५

४-इन धर्मशास्त्रों में अनेक विचार आप को ऐसे मिलेंगे कि जिन को न जानने के कारण ही आप उन कामों को विरुद्ध करते होंगे । और जब जान लोगे तो ठीक २ करने लगोगे । तब उस से आप का कुछ कल्याण भी अवश्य होगा । जैसे शिर बांध के भोजन न करना, शिर खोल के मल मूत्र त्याग न करना, पूर्व को पग करके कदापि न सोना, इत्यादि कामों के करने में जो कुछ समय वा श्रम आप करते हैं वही आगे भी लगेगा पर यदि शास्त्र की आज्ञानुकूल उन २ कामों को करोगे तो सहज में ही कुछ धर्म कर लोगे ।

५-यद्यपि सभी धर्मशास्त्र अनेक प्रकार से मनुष्य को कल्याण का मार्ग दिखाने वाले होने से अत्युम हैं तथापि कात्यायन, व्यास, पराशर, शंख, दक्ष, गौतम और वसिष्ठादि कई स्मृतियां उन में और भी अत्यन्त उपकारी हैं । कात्यायन में कर्मकाण्ड, व्यास में पातिव्रताधर्म, दानधर्मादि, पराशर में ब्रह्मकूर्च व्रतादि, शंख में वर्णाश्रम धर्मादि, दक्ष में दिनचर्या वा रात्रिचर्या-योगाभ्यासादि, गौतम में ४८ अड़तालीस संस्कारादि, वसिष्ठ में संन्यासादि, विषय अधिक प्रशंसनीय हैं ।

६-इन स्मृतियों में, शिक्षा, विद्या, सामान्यनीति, राजनीति, स्त्रीशिक्षा, योग, ज्ञान, उपासना, देवपूजा और धर्मादि का विचार ऐसा भी है जो सभी के लिये उपयोगी होगा ।

७-विशेष कर स्मृतियों के संक्षिप्त विषय-१-प्रायश्चित्त, २-वर्णधर्म, ३-आश्रम धर्म, ४-सूतक शुद्धि, ५-द्रव्यशुद्धि, ६-गर्भाधानादि संस्कार, ७-सन्ध्या, ८-श्राद्ध-तर्पण, ९-पञ्चमहायज्ञ, १०-पातिव्रतधर्म, ११-भक्ष्याभक्ष्य, १२-आपद्धर्म, १३-वेद का अभ्यास तथा महत्त्व, १४-आचार, इत्यादि संक्षेप से धर्मशास्त्रों का विषय जानो ॥

८-हमारी राय जाति निर्णय के विषय में यह है कि जो कायस्थ, रथकार, स्वर्णकार, आदि जाति हैं वे लोग धर्मशास्त्रों में लिखे निर्विवाद उत्तमाचरणों के द्वारा श्रेष्ठ बनने का उद्योग करें तो उन के लिये भविष्यत् में कल्याण की संभावना है ।

९-दक्षस्मृति में नौ २ की संख्या वाले नौनवें इकासी उपदेश देखने योग्य सब के लिये विशेष उपकारी हैं ।

१०-इन स्मृतियों के जो २ पारिभाषिक शब्द (ब्रह्मकूर्च, कृच्छ्र, समकृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, कृच्छ्रातिकृच्छ्र, कृच्छ्रसान्तपन, प्राजापत्य, पराककृच्छ्र, चान्द्रा-

६ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥

यण ) इत्यादि के लक्षण वा अर्थ गोतमस्मृति के २७ । २८ अध्यायादि में वा अन्यस्मृतियों में जहां २ कहे हैं वहीं से पाठक महाशय जानकर सर्वत्र वही लक्षण जान लेवें । इसीसे जहां २ कृच्छ्रादि शब्द आये हैं वहां २ सर्वत्र उनके लक्षण हमने नहीं दिखाये हैं । ब्रह्मकूर्च व्रत की प्रशंसा धर्मशास्त्रों में बहुत बढके की गयी है । इस ब्रह्मकूर्च का लक्षण व्याख्यान वा विधान पराशर स्मृति के ११ वें अध्याय में देखिये ।

११-कृच्छ्रादि सभी व्रतों के लिये सामान्य विचार ये हैं कि-ब्राह्मणादि द्विज शिखा को छोड़ के अन्य सब मूंछों सहित बाल मुड़ा के अपने २ वर्ण के दण्ड, कमण्डलु, मेखला, श्वेत लाल पीले वस्त्र तथा मृग चर्मादि ब्रह्मचर्य के चिह्न धारण कर के बाग, देवस्थान, वा जलाशय के तट पर शुद्ध एकान्त स्थान में रहें, संसारी काम अथवा बात चीत कुछ न करें, शूद्रादिनीचों से कुछ भी न बोलें, प्रयोजन मात्र द्विजों से बोलें, प्रायः मौन रहें, तीन बार स्नान करें वा छः बार स्नान करें अपने २ गुरु मन्त्र सावित्री का जप करें, व्याहृतियों से होम करें इत्यादि नियम भी पाठकों को इन्हीं धर्म शास्त्रों के देखने से ज्ञात होंगे ।

१२-अब अन्तिम निवेदन यह है कि इन १८ स्मृतियों के छपाने वा अर्थ करने में यथासम्भव हम ने सावधानी से शुद्ध करने का उद्योग किया है। तथापि कई कारणों से जो २ त्रुटि हमारे पाठकों को ज्ञात हों उन को पण्डितों की राय से सम्हाल लें और हमारे गुण वा परिश्रम को सादर स्वीकार करते हुए तथा दोषों पर ध्यान न देते हुए उनसे उपेक्षा वृत्ति करें । क्योंकि मनुष्यको गुण ग्राही होने में जो लाभ तथा सुख होता है वह दोष दर्शी को कदापि नहीं होता । परन्तु जो२ अशुद्धि तथा अर्थ करने में कहीं२ भूल जान पड़े उनको विचार पूर्वक शुद्ध करने का उद्योग अवश्य करें

ह० भीमसेन शर्मा
सम्पादक ब्राह्मण सर्वस्व इटावा

अथाष्टादशस्मृतीनां सूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामानिपृष्ठानि
वर्णधर्माः१-अत्रिस्मृतौ-
ब्राह्मणधर्माः
अभक्ष्यभक्षणादि प्रायश्चित्तानि१२
कृच्छ्रमान्तपनादि व्रतानि२१
स्त्रीधर्माः२४
ब्राह्मणलक्षणानि२५
सामान्यधर्माः२७
यतिधर्माः२८
महापातकादि प्रायश्चित्तानि२९
१०स्त्रीणां शौचम्३४
११संन्यासान्निवृत्तौ प्रायश्चित्तम्३८
१२कृषिकर्मणि धर्मरक्षा३९
१३अगम्यागमनादि प्रायश्चित्तानि४१
१४अस्पर्श्यस्पर्शादि प्रायश्चित्तानि४८
१५पञ्चगव्यपरिमाणम्५२
१६अष्टावसरेषु मौनव्रतम्५८
१७दान धर्माः५७
१८श्राद्धे सुपात्रादिविचारः५९
१९विशेषेण चास्यां स्मृतौ सर्वविधानि प्रायश्चित्तानि सन्ति
२०गर्भाधानादि संस्कारविचारः२-विष्णुस्मृतौ
२१ब्रह्मचर्याश्रम विचारः
२२गृहाश्रम धर्म विचारः
२३अतिथि पूजन विचारः
२४वानप्रस्थ धर्म विचारः
२५संन्यास धर्म विचारः१२
२६क्षत्रिय धर्म विचारः१३
२७सृष्टि रचना क्रम३-हारीतस्मृतौ
२८ब्राह्मण धर्माः
२९क्षत्रिय धर्मः
३०वैश्य धर्मः

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामपृष्ठानि
३१शूद्र धर्मः
३२ब्रह्मचारि धर्माः
३३गृहस्थ धर्माः११
३४दन्त धावन विचारः१२
३५सन्ध्योपासन सूर्यार्घ्य विधिः१३
३६मध्याह्नस्नान सन्ध्यादि कृत्यम्१४
३७आचमनत्रिविधजपयज्ञादि विचारः१७
३८अतिथि पूजादि मध्याह्न कृत्य विधि१९
३९वानप्रस्थ कृत्यविधिः२३
४०संन्यासाश्रमकर्त्तव्यविधिः२४
४१योगाभ्यास विधिः२८
४२अनुलोमप्रतिलोमाभ्यां वर्णसंकरोत्पत्तयः ।४-औशनसस्मृतौ१-८
४३बहुविधानि प्रायश्चित्तानि । विशेषेणतुनीलीसंसर्गे ।५-अङ्गिरःस्मृतौ१-११
४४विविधानि प्रायश्चित्तानि६-यमस्मृतौ
४५पञ्चगव्यग्रहणे विशेषविचारः११
४६पितृभ्यः पिण्डदाने विशेषः१२
४७गोवृषभबधताडनभेदेषु प्रायश्चित्तानि६-आपस्तम्बस्मृतौ
४८द्रव्यशुद्धि विचारः
४९म्लेच्छसंसर्गप्रायश्चित्तानि ॥
५०अशक्तप्रायश्चित्तम्
५१चाण्डालादि संसर्गप्रायश्चित्तम्१०
५२स्पर्शादि दोष प्रायश्चित्तम् ।१२
५३नीली वस्त्रादि धारणे प्रायश्चित्तम्१४
५४रजस्वलास्पर्शादौ शुद्धिविचारः१६
५५भोज्याभोज्यान्नादि विचारः२७
५६मोक्षसाधनं क्रोधादि त्यागश्च३०
५७ब्रह्मचर्याश्रम धर्माः८-संवर्त्तस्मृतौ
५८गृहाश्रम धर्मः ।
५९दान धर्म माहात्म्यम्
६०कन्यादान फलम्१०

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ ३

संख्याविषयाःस्मृतिनामानिपृष्ठानि
६१वानप्रस्थाश्रमः,,१६
६२चतुर्थाश्रम विचारः,,१६
६३ब्रह्महत्यादि महापातक प्रायश्चित्तानि,,१७
६४क्षत्रियादि हिंसाप्रायश्चित्तानि ।,,२०
६५अगम्यागमन प्रायश्चित्तानि,,२३
६६प्रदुष्टादि प्रायश्चित्तानि,,२७
६७सर्वानर्थनिवारणाय जपहोमादिविचारः,,३१
६८आचमनेन्द्रियस्पर्श विधिः९-कात्यायन स्मृतौ
६९षोडशमातृका पूजन विचारः,,
७०घतोर्द्धोराकरणविचारः,,
७१नान्दीश्राद्धावश्यकत्वप्रदर्शनम्,,
७२कर्मकाण्डे सामान्य विचारः,,
७३श्राद्ध विशेष विचारः ।,,
७४सर्वकर्मसु नान्दीश्राद्धादि विचारः,,
७५अग्न्याधान कालादि विचारः ।,,१२
७६अरणी निर्माण विधिः,,१५
७७अरणी मन्थन प्रकारः ।,,१७
७८यज्ञ पात्र समिधादि विचारः ।,,१८
७९अग्निहोत्र काल विचारः,,२१
८०परिसमूहन पर्युक्षणादि विचारः,,२२
८१आहुति प्रमाणम् । ज्वलितेऽग्नौ होमविधिश्च,,२३
८२अग्नि धमन प्रकारः ।,,२३
८३दन्त धावन विचारः ।,,२४
८४नित्य स्नान तर्पण विचारः ।,,२५
८५सन्ध्योपासन विधिः ।,,२६
८६नित्यतर्पण विधानम्,,२८
८७पञ्चमहायज्ञ विधिः,,३१
८८ब्रह्मयज्ञस्य सर्वोपरि माहात्म्यम् ।,,३४
८९दक्षिणा दान विचारः ।,,३६
९०शेष यज्ञपात्रलक्षणानि ।,,३७

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामानिपृष्ठानि
८१+ पिण्ड पितृ यज्ञ विधानम् ।३९
८२अग्न्याधानान्ते शेषकृत्यविचारः ।४६
८३आहिताग्नेर्नियमातिचारे प्रायश्चित्तानि ।४७
८४आहिताग्नेः प्रवासकाले कर्त्तव्यविचारः५०
८५पत्नीनां यज्ञानुज्ञाविचारः ।-५१
८६यजमानपत्न्योरितरेकस्य ताभावे पुनराधानादि विचारः ।५२
८७आहिताग्नेरन्त्येष्टि कर्मविधिः ।+५५
८८दाहान्ते तिलाञ्जल्यादि शेष कृत्यम्५८
८९आहिताग्नेर्विदेशमरणेऽन्त्येष्टिदाहादि विचारः ।६०
९०अस्थिसंचयन कर्म विधिः ।६१
९१सूतकेऽग्निहोत्रादिकर्मनिर्वाह विचारः६२
९२अग्निहोत्रिणः सपिण्डीकरणाद्यदि विचारः ।-६३
९३गर्भाधानादि होमेषु सामान्यविचारः६४
९४ब्रह्मचारिणः कृत्यम् ।६६
९५चरुपशुकान्तादिमाध्यहोमे विशेषविचारः ।६७
९६कर्मकाण्डे पारिभाषिक शब्दादि विचारः ।७०
९७दानधर्मे भूमिदानस्य विशिष्टं माहात्म्यम् ।१० बृहस्पतिस्मृतौ
९८गयाश्राद्धवृषोत्सर्गौ
९९भूम्यादि ब्रह्मस्वहरणे कुलक्षयादिदोषाः ।
१००मूर्खाय दाननिषेधो विदुषे दानसाफल्यम् ।
१०१कूपतडागादि निर्माणान्नजलादिदानप्रशंसा ।१०
१०२धर्मशास्त्रप्रस्तावः ।११-पाराशरस्मृतौ
१०३कृतयुगादिषु धर्मशक्त्यादिह्रासः ।
१०४सदाचारादि ब्राह्मण धर्मः ।
१०५पञ्चमहायज्ञेष्वतिथियज्ञस्य विशिष्टं माहात्म्यम् ।
१०६कात्यारणो वर्णधर्मः१०
१०७ब्राह्मणादि गृहस्थानां धर्मः ।१२
१०८कृषिकर्मणि विशेष विचारः ।१२
१०९जन्ममरणयोरशौचादिव्याख्यानम् ।१४
११०अपमृत्युना मरणे दाहादिनिषेधः ।२३
१११पतितादिसंसर्गे प्रायश्चित्तम् ।२४
११२स्त्रीपुरुषयोर्धर्मः । गर्भपातादिप्रायश्चित्तम् ।२५
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
संख्याविषयाःस्मृतिनामपृष्ठानि
१२३श्वादिशुनादीनां प्रायश्चित्तानि ।,,२८
१२४आहिताग्नेविदेशमरणेऽन्त्येष्टिप्रकारः,,३०
१२५प्राणिहत्याप्रायश्चित्तम् ।,,३२
१२६चाण्डालादिनीचैः सह संभाषणादौ प्रा०,,३५
१२७द्रव्य शुद्धिप्रकारः ।,,४३
१२८ऋतुकालात्पूर्वं कन्योद्वाहः ।,,४४
१२९रजस्वलास्पर्शादि प्रायश्चित्तानि ।,,४५
१३०गोवधादिप्रायश्चित्तम्,,५०
१३१धर्म सभया प्रायश्चित्तादि निर्णयः,,५२
१३२सभयापि राजानुमतया धर्मनिर्णयः कार्यः,,५४
१३३गोहत्यादि प्रायश्चित्तम् ।,,५५
१३४गोवृषभहत्याभेदेषु प्रायश्चित्तभेदव्याख्या ।,,५७
१३५अगम्यागमनव्यभिचारादि प्रायश्चित्तानि ।,,६१
१३६अभक्ष्यभक्षणादि प्रायश्चित्तानि ।,,७४
१३७ब्रह्मकूर्चव्रतव्याख्यानं माहात्म्यं च ।,,७८
१३८पञ्चविधानि स्नानानि ।,,८४
१३९आचमन विधिः ।,,८५
१४०गृहे रक्षणीयानि वस्तूनि ।,,८९
१४१दानपात्रं कुटुम्ब्यादि ।,,९०
१४२कृच्छ्रव्रत प्रत्याम्नायः ।,,९१
१४३ब्रह्महत्याप्रायश्चित्ते सेतुबन्धगमन विधिः ।,,९२
१४४सुरापानादि महापातक प्रायश्चित्तम् ।,,९३
१४५धर्मशास्त्र प्रस्तावः१२-व्यासस्मृतौ
१४६चाण्डालादयो वर्णसंकराः ।,,
१४७गर्भाधानादयः षोडश संस्काराः ।,,
१४८ब्रह्मचारिणो नियम धर्माः ।,,
१४९गृहस्थस्य विवाहादयो धर्माः ।,,
१५०सुभगाया गृहिण्याः पतिसेवाद्यो नित्यधर्माः ।,,११
१५१तस्याएव नैमित्तिकानि कर्त्तव्यानि ।,,१४
१५२इत्थमाचरन्ती पतिव्रता भवति ।,,१२
१५३त्यागाह्र्याः स्त्रियः ।,,१६

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामपृष्ठानि
१५४गृहस्थस्य प्रातरुत्थाय शयनावधि नित्यनैमित्तिकादिकर्त्तव्यक्रमः । ,,,,१७
१५५गृहस्थस्य परमो धर्मः ।,,२९
१५६दानधर्मस्य सर्वोपरिरोचकं माहात्म्यम् ।,,३१
१५७वर्णधर्माः१३-शंखस्मृतौ
१५८गर्भाधानादयः संस्काराः ।,,
१५९ब्रह्मचर्य्यधर्माः,,
१६०विवाहकरणव्याख्या ।,,
१६१पञ्चमहायज्ञवर्णनम् ।,,
१६२चतुराश्रमिणां पञ्चाग्न सारभूताः परमधर्माः ।,,११
१६३वानप्रस्थस्य संक्षेपेण कर्त्तव्यम् ।,,१२
१६४संन्यासिनः कर्त्तव्यम् ।,,१४
१६५अध्यात्मचिन्तायामात्मज्ञानप्रकारः ।,,१६
१६६षड्विधस्नानव्याख्यानम् ।,,१८
१६७क्रियास्नानविध्यध्यायः ।,,२१
१६८आचमनविधिव्याख्यानम् ।,,२४
१६९वेदोक्तपावनमन्त्रपरिगणनम् ।,,२७
१७०गायत्रीजपस्य विधिर्माहात्म्यं च ।,,२८
१७१* तर्पणविधिमाहात्म्याध्यायः ।,,३१
१७२* श्राद्धविधिमाहात्म्याध्यायः ।,,३४
१७३सर्वविधसूतकशुद्धिव्याख्या ।,,३९
१७४द्रव्यशरीरादि शुद्धिव्याख्यानम् ।,,४२
१७५महापातकादि प्रायश्चित्तानि ।,,४६
१७६इष्ट पूर्तधर्मव्याख्या ।१४-लिखितस्मृतौ
१७७मृतस्य गंगायामस्थिपातनादिना स्वर्गः ।,,
१७८मृतस्य पिण्डदान सपिण्डी करणादिकर्म ।,,
१७९सन्ध्योपासनादि कृत्यम् ।,,१०
१८०अपमृत्युमृते प्रेतकृत्यनिषेधः ।,,११
१८१पतितसंसर्गादिप्रायश्चित्तानि ।,,१२
१८२अनुपनीतबाले दोषाभावः ।१५-दक्षस्मृतौ
१८३ब्रह्मचर्याश्रमविचारः ।,,
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
संख्याविषयाःस्मृतिनामानिपृष्ठानि
१८४नित्यं नैमित्तिकं च प्रातरारभ्य क्रमेण कर्त्तव्यविचारः
१८५प्रातःस्नानं पञ्चविधस्नानविचारश्च ।
१८६आचमनेन्द्रियस्पर्शसन्ध्योपासननित्यहोमदेवपूजाश्चेति दिवसस्याद्यभागकृत्यानि-
१८७दिवसस्य द्वितीयभागे वेदाभ्यासः पञ्चविधः
१८८पोष्यवर्गभरणपोषणविधिस्तृतीयभागकृत्यम् ।
१८९चतुर्थभागे वेदोक्तविधिना स्नानमध्याह्न सन्ध्योपासनोपस्थान तर्पणानि कर्त्तव्यानि१०
१९०दिवसस्य पञ्चमभागे द्वादशनादावसरे पञ्चमहायज्ञविधानम्१२
१९१षष्ठसप्तमभागयोरितिहासपुराणाद्यवलोकनम् ।१४
१९२अष्टमभागे ग्रामादितो बहिःशौचस्नानादिपुरस्सरं सायंसन्ध्योपासनं होमश्च -१४
१९३निशायाः प्रदोषप्रहरे चतुर्थप्रहरे च सन्ध्योपासनादिरूपेण वेदाभ्यासो मध्ये यामद्वयं शयनम्१४
१९४अमृतादिरूपाणां नवानां नवकानां विचारः ।१५
१९५दानधर्मविचारः ।१८
१९६धर्मपत्नीविचारः ।२०
१९७शरीरशुद्धिविचारः२३
१९८जननमरण सूतकशुद्धिविचारः ।२५
१९९योगाभ्यासतत्त्वज्ञानविषयः ।२८
२००ब्रह्मचर्याश्रमधर्माः१६-गौतमस्मृतौ
२०१ब्रह्मचारिणो नित्यनियमाः ।
२०२नैष्ठिकब्रह्मचारिकृत्यम् ।
२०३गृहस्थाश्रमे ब्राह्मादि विवाहलक्षणानि ।११
२०४वर्णसंकराः ।१२
२०५पञ्चमहायज्ञानां विशेषेणातिथिपूजनव्याख्या ।१३
२०६अभ्युत्थानाभिवादनादिना मान्यानां सत्कारः।१६
२०७आपत्काले वैश्यवृत्त्यादिजीविकाविचारः ।१८
२०८बहुश्रुतब्राह्मणलक्षणम् ।२०
२०९अष्टाचत्वारिंशत्संस्काराणां व्याख्यानम् ।२१

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामपृ०
२१०स्नातकधर्माः ।,,२२
२११राजधर्मव्याख्यानम् ।,,२७
२१२मृतसूतकशुद्धिव्याख्या ।,,३९
२१३मृतानां श्राद्धकर्मविधिः ।,,४१
२१४उपाकर्मविधिर्वेदानध्ययाश्च ।,,४५
२१५भक्ष्याभक्ष्यविचारः ।,,४७
२१६स्त्री धर्माः ।,,४९
२१७सर्वपापनाशनपुरस्सरं निःश्रेयसप्राप्तये कृत्यम्,,५२
२१८पूर्वजन्मकृत दुष्कृतचिह्नानि ।,,५४
२१९जीवितायैवपतिताय तिलाञ्जलिः ।,,५६
२२०पतितव्याख्यानम् ।,,५७
२२१ब्रह्महत्याप्रायश्चित्तम् ।,,५८
२२२मद्यपगुरुतल्पगयोः प्रायश्चित्तानि ।,,६२
२२३रहस्यगुप्तपापप्रायश्चित्तानि ।,,६४
२२४अवकीर्णि प्रायश्चित्तम् ।,,६६
२२५कृच्छ्रत्रयविधानम् ।,,६७
२२६चान्द्रायणव्रतविधिः ।,,६९
२२७भ्रातॄणां दायविभागः ।,,७१
२२८पूर्वजन्मकृतचिह्न लक्षितपापानां प्रायश्चित्तप्रस्तावः॥ १७-शातातपस्मृतौ
२२९ब्रह्महत्यादिहिंसाप्रायश्चित्तानि ।,,
२३०सुरापानादिप्रायश्चित्तानि ।,,१७
२३१सुवर्णस्तेयादि प्रायश्चित्तानि ।,,२१
२३२अगम्यागमन पापप्रायश्चित्तानि ।,,२६
२३३अपमृत्युना मृतानां तारणाय विधानम् ।,,३४
२३४धर्मार्हदेशविचारः।८१-वसिष्ठस्मृती
२३५महापातकोपपातकानि,,
२३६ब्राह्मादिषड्विवाहव्याख्यानम् ।,,
२३७वर्णधर्मविचारः।,,
२३८आपद्धर्मो वर्णानाम् ।,,
२३९कृषिव्याख्यानं तत्र धर्मः ।,,

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ ९

संख्याविषयाःस्मृतिनामपृ०
२४०वार्धुषिकादीनामभक्ष्यमन्नादि ।वसिष्ठस्मृतौ१०
२४१पात्रापात्रविवेकः ।,,१२
२४२आततायिब्राह्मणस्यापि वधे न दोषः,,१४
२४३पङ्क्तिपावना ब्राह्मणाः ।,,१५
२४४ब्राह्मणवैश्ययोःशस्त्रग्रहणावसरः ।,,१७
२४५आचमनविधिः । शुद्धाशुद्धिविवेकश्च ।,,१७
२४६द्रव्यशुद्धिविचारः ।,,१८
२४७चातुर्वर्ण्योत्पत्तिः ।,,२०
२४८अन्त्येष्टिविधिर्मरणसूतक शुद्धिश्च ।,,२१
२४९स्त्रीणां धर्मविचारः ।,,२४
२५०आचारस्य प्रशंसा व्याख्यानं च ।,,३१
२५१ब्रह्मचारिधर्मः ।,,३२
२५२गृहस्थधर्मेऽतिथिपूजनं विशिष्टम् ।,,३३
२५३वानप्रस्थाश्रमिणः कर्तव्यम् ।,,३५
२५४संन्यासधर्म विषयः ।,,३६
२५५अतिथि सेवाप्रकारः ।,,३८
२५६पितृश्राद्ध विषयः ।,,४१
२५७ब्राह्मणादिब्रह्मचारिणां दण्डादिभेदाः,,४५
२५८स्नातक व्रतानि ।,,४७
२५९उपाकर्म वेदानध्यायाश्च,,४९
२६०गुर्वादिसाम्मान्यानामभिवादनादिनामान्यम् ।,,५३
२६१भक्ष्याभक्ष्यवर्णनम् ।,,५५
२६२दत्तकपुत्रग्रहण विधिस्तद्दायभागश्च ।,,६०
२६३राजधर्मस्य व्याख्यानं साक्षिणश्च ।,,६२
२६४पुत्रप्रशंसा द्वादशपुत्रव्याख्यानं तद्दायभागविचारश्च ।,,६६
२६५नियोग विषयः ।,,७१
२६६ऋतुकालात्पूर्वं कन्योद्वाहोऽन्यथापापित्वम् ।,,७२
२६७पत्युर्विदेशगमने स्त्रियाः कर्तव्यम् ।,,७४
२६८अदायादस्य धनादिकं केनादेयमिति विचारः,,७५

१०

अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥

संख्याविषयाःस्मृतिनामपृ०
२६९चाण्डालादिबर्णसंकरोत्पत्तिः।,,७५
२७०राज्ञो निजधर्म विषयः।,,७८
२७१महापातकलक्षणतन्निस्तारादिप्रायश्चित्तानि।,,८१
२७२अगम्यागमनादि प्रायश्चित्तानि।,,८७
२७३जपतपोहोमादिना सर्वविधपापनिवृत्तौ निःश्रेयसम्,,९२
२७४आत्महत्या प्रायश्चित्तादिकम् ।,,९४
२७५चान्द्रायणातिकृच्छ्रादिव्रतविधिः ।,,९८
२७६सर्वविधपापनाशार्थवेदोक्तपवित्रमन्त्रसूक्तसामादिसंग्रहः ।१०८
२७७सुवर्णादि दानमाहात्म्यम् ।,,११०
२७८ग्रन्थे धर्मोपदेशस्तृष्णात्यागादेशश्च ।,,११३

इत्यष्टादशस्मृतिविषयसूचीपत्रं समाप्तम् ॥

॥ अत्रिस्मृतिः ॥

हुताग्निहोत्रमासीन-मत्रिंवेदविदांवरम् ।
सर्वशास्त्रविधिज्ञंत-मृषिभिश्चनमस्कृतम् ॥ १ ॥
नमस्कृत्यचतेसर्व-इदंवचनमब्रुवन् ।
हितार्थंसर्वलोकानां भगवन्कथयस्वनः ॥ २ ॥

अत्रिरुवाच ॥

वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञा यन्मेपृच्छथसंशयम् ।
तत्सवैंसंप्रवक्ष्यामि यथादृष्टंयथाश्रुतम् ॥ ३ ॥

भाषार्थ— अग्निहोत्र करने वाले वेदज्ञों में उत्तम संपूर्ण शास्त्रों की विधि के ज्ञाता, और ऋषियों से पूज्य बैठे हुए अत्रिजी को ॥१॥ वे संपूर्ण ऋषि नमस्कार करके यह वचन बोले कि हे भगवन् ! संपूर्ण मनुष्यों के हित के लिये आप हम को उपदेश करें ॥ २ ॥ अत्रि जी बोले कि-हे वेद और शास्त्र के रहस्य (अर्थ) के यथार्थ जानने वाले ऋषि लोगो-जो संशय मुझ से तुम पूछते हो उस संपूर्ण को अपने देखे और सुने के अनुसार मैं वर्णन करूंगा ॥ ३ ॥

विशेष—(१।२।३) अग्निहोत्र करने तथा वेद को जानने वाले अत्रि जी ने यह धर्मशास्त्र कहा इस कथन से इस की वेदमूलकता दिखायी है। अध्यात्म में (वागत्रिः-इति श्रुतिः) वाणी अत्रि है। वाणी में आने पर ही वह विषय उपदेश वा धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। मन में रहे तब तक वह उपदेश नहीं यह जताने के लिये अत्रि जी का उपदेश अठारहों में पहिले रक्खा गया है। उपदेशकी परम्परा दिखाने के लिये प्रश्नोत्तर द्वारा शास्त्र की प्रवृत्ति दिखाई है ॥

२ भाषासंहिता ॥

सर्वतीर्थान्युपस्पृश्य सर्वान्देवान्प्रणम्यच । जप्त्वातुलसर्वसूक्तानि सर्वशास्त्रानुसारतः ॥ ४ ॥ सर्वपापहरं दिव्यं सर्वसंशयनाशनम् । चतुर्णामपिवर्णाना-मत्रिःशास्त्रमकल्पयत् ॥ ५ ॥ येचपापकृतोलोके येचान्येधर्मदूषकाः । सर्वपापैःप्रमुच्यन्ते श्रुत्वेदंशास्त्रमुत्तमम् ॥ ६ ॥ तस्मादिदंवेदविद्भि-रध्येतव्यंप्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्चप्रवक्तव्यं सद्वृत्तेभ्यश्चधर्मतः ॥ ७ ॥ अकुलोनेह्यसद्वृत्ते जडेशूद्रे शठे द्विजे । एतेष्वेवनदातव्य-मिदंशास्त्रंद्विजोत्तमैः ॥ ८ ॥


भा०-संपूर्ण तीर्थों के जल से अभिषेक सब देवताओं को नमस्कार और संपूर्ण वेद सूक्तों का जप करके सर्वशास्त्रों के अनुसार ॥४॥ सर्व पापों का नाशक उत्तम सब संशयों का दूर करने वाला और चारों वर्णों का हितकारी शास्त्र अत्रि ऋषि ने रचा ॥५॥ जो जगत् में पापों के करने वाले हैं, और जो धर्म में दूषण लगाने वाले हैं वे संपूर्ण इस उत्तम शास्त्र को श्रवण कर सब पापों से छूट जाते हैं ॥ ६ ॥ इस लिये वेदज्ञ पुरुष इस शास्त्र को बड़े प्रयत्न से पढ़ें और सदाचारी शिष्यों को धर्मानुकूल पढ़ावें ॥७॥ श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणों को चाहिये कि-अकुलीन दुराचारी-मूर्ख-शूद्र-और शठ ब्राह्मण, इन को न पढ़ावें ॥८॥

विशेष-( ४ ) तीर्थ स्नान देवताओं का पूजन तथा विधिपूर्वक वेद मन्त्रों का जप इन कामों को जब तक श्रद्धा के साथ निरन्तर बहुत काल तक न किया जाय तब तक किसी का अन्तःकरण शुद्ध नहीं होता और शुद्धान्तःकरण हुए बिना उस के हृदय से निकला उपदेश भी ठीक शुद्ध सर्व हितकारी वेदानुकूल नहीं होता इसी से अत्रि जी ने तीर्थस्नानादि किया ( ६ ) यदि पापी लोग उत्तम उपदेश को ठीक ध्यान देकर सुनें तो अवश्य अपने धर्म विरुद्ध दुराचारों से ग्लानि हो तब सब पापों से छूटना सम्भव ही है ( = ) जैसे सांप को पिलाया अमृत भी विष होजाता वैसे अकुलीनादि निकृष्ट को किया उत्तमोपदेश भी हानिकारक परिणाम जनक होता है ॥

अत्रिस्मृतिः ॥ ३

एकम्प्यक्षरं यस्तु गुरुःशिष्यंनिवेदयेत् । पृथिव्यांनास्तितद् द्रव्यंयद्दत्त्वाह्यनृणीभवेत् ॥ ९ ॥ एकाक्षरप्रदातारं योगुरुंनाभिमन्यते । शुनांयोनिशतंगत्वा चाण्डालेष्वभिजायते ॥ १० ॥ वेदंगृहीत्वायःकश्चित् शास्त्रंचैवावमन्यते । ससद्यःपशुतांयाति संभवानेकविंशतिम् ॥ ११ ॥ स्वानिकर्माणि कुर्वाणा दूरे संतोपिमानवाः । प्रियाभवन्तिलोकस्य स्वेस्वेकर्मण्युपस्थिताः ॥ १२ ॥ कर्मविप्रस्ययजनं दानमध्ययनंतपः । प्रतिग्रहोऽध्यापनंच याजनंचेतिवृत्तयः ॥ १३ ॥


भा०-जो गुरु एक भी अक्षर शिष्य को देता है पृथिवी भर में वह कोई ऐसा द्रव्य नहीं है जिस को देकर शिष्य गुरु का अनृणी हो सके (अर्थात् बदला देसके) ॥ एक अक्षर देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह सौ जन्म तक कुत्तों की योनि में जाकर चांडालों में जन्मता है ।१० जो कोई कुतर्की वेद और शास्त्र को जानकर अपमान करता है वह शीघ्र ही पशु योनि को पाता और पश्चात् इक्कीस प्रकार के नरकों को प्राप्त होता है ॥११॥ अपने २ कर्मों को करने वाले और दूर रहने पर भी मनुष्य अपने कर्म पर स्थिर रहने से जगत् के प्यारे होते हैं ॥ १२ ॥ केवल धर्म संचयार्थ ब्राह्मण के कर्म ये हैं कि यज्ञ करना, दान देना, साङ्गवेद पढ़ना और तप करना, और दानलेना पढ़ाना और यज्ञ कराना ये तीन ब्राह्मण की वृत्ति धर्मानुकूल आजीविका हैं ॥१३॥

( ९ । १० ) एकाक्षर से अभिप्राय यह है कि जो विधि पूर्वक थोड़ा भी पढ़ावे अथवा एकाक्षर नाम प्रणव को ठीक २ सार्थ पढ़ावे उस को भी गुरु अवश्य माने। न माने तो निन्दार्थवाद है यह उत्सर्ग जानो॥ किसी कारण गुरु पतित वा नास्तिकादि हो जाय तो उसे गुरु न माने ऐसा लेख जहां मिले वह इस का अपवाद होगा ( १२ ) इस का मतलब यह है कि विदेश में जाने पर भी अपने देशाचारानुकूल अपने २ वर्ण के कामों को कदापि न छोड़े अर्थात् ऐसा न करें कि विलायत जांय तो साहब बन के ही लौटें ॥

४ भाषार्थसंहिता-

क्षत्रियस्यापियजनं दानमध्ययनंतपः । शस्त्रोपजीवनंभूत रक्षणंचेतिवृत्तयः ॥ १४ ॥ दानमध्ययनंवार्ता यजनंचेतिवैविशः * । शूद्रस्यवार्ताशुश्रूषा द्विजानांकारुकर्मच ॥ १५ ॥ तदेतत्कर्माभिहितं संस्थितायत्रवर्णिनः । बहुमानमिहप्राप्य प्रयान्तिपरमांगतिम ॥ १६ ॥ येव्यपेताःस्वधर्मात्ते परधर्मेव्यवस्थिताः । तेषांशास्तिकरोराजा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ आत्मीयेसंस्थितोधर्मे शूद्रोपिस्वर्गमश्नुते । परधर्मोभवेत्त्याज्यः सुरुपपरदारवत् ॥ १८ ॥

भा०-यज्ञ करना, दान देना, साङ्गवेद पढ़ना और तप करना, ये क्षत्री के कर्म हैं और शस्त्रसे आजीविका और भूतों की रक्षा ये दो धर्मानुकूल क्षत्रियकी जीविका हैं ॥१४॥ दान देना, साङ्गवेद पढ़ना, खेती गौओं की रक्षा, व्यवहार, यज्ञ करना, ये वैश्यके कर्म हैं खेती, गौओंकीरक्षा, व्यवहार, तीनों वर्णों की सेवा, और कारीगरी, ये शूद्र के कर्म हैं॥१५॥ जिस कर्म में तत्पर रहने से चारों वर्ण इहलोक में बड़े मान को प्राप्त होकर परलोक में परमगति को प्राप्त होते हैं सो यह वर्णकर्म हमने कहा ॥१६॥ जो अपने धर्म को छोड़ के दूसरे के धर्म में तत्पर होते हैं उन को शिक्षा देने वाला राजा स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होता है ॥१७॥ अपने धर्म में तत्पर हुआ शूद्र भीस्वर्ग को भोगता है और पराया धर्म इस प्रकार त्यागने योग्य है किजैसे श्रेष्ठरूप वाली पराई स्त्री ॥ १८ ॥

(१८) जैसे विष में पैदा हुआ कीड़ा विषसे मरतानहीं किन्तु विष ही उस का रक्षक होता है । इसी के अनुसार अपने २ बाप दादों की परम्परा से जो २ धर्म जिस वर्ण के अनुसार चला आता है उसी को अपना प्राकृत धर्म कर्म मानकर मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । प्रत्येक मनुष्य का प्रयोजन सर्वोत्कृष्ट सुख स्वर्ग प्राप्त करने का है सो जब शूद्रादि को स्वधर्म के सेवन से स्वर्ग और पराये उत्तम धर्म से भी नरक होना सिद्ध है तब किसी को भी भयदायकपरधर्म का सेवन न करना चाहिये ॥ * विचार्यमत्र ॥

अग्निसमृतिः ॥ ५

वध्योराज्ञासवैशूद्रो जपहोमपरश्चयः ।
ततोराष्ट्रस्यहन्तासौ यथावन्हेेश्चवैजलम् ॥१९॥
प्रतिग्रहोऽध्यापनंच तथाऽविक्रेयविक्रयः ।
याज्यंचतुर्भिरप्येतैः क्षत्रविट्पतनंस्मृतम् ॥२०॥
सद्यःपततिमांसेन लाक्षयालवणेनच ।
त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयी ॥२१॥
अव्रताश्चानधीयाना यत्रभैक्ष्यचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभुक्तप्रदण्डवत् ॥२२॥
विद्वद्भोज्यमविद्वांसो येपुराष्ट्रेपुभुञ्जते ।


भा०-जो शूद्र वेदोक्त जप और होम में तत्पर है वह राजा से कठोर दण्ड पाने के योग्य है क्योंकि वह जप होम में तत्पर होने के कारण राजा के देश का नाश करने वाला है जैसे अग्नि का जल नाशक है ॥ १९ ॥ दान लेना वेदादि का पढ़ाना, निषिद्ध वस्तु का बेचना, और यज्ञ कराना इन चारों कर्मों के करने से क्षत्रिय और वैश्य का पतित होना कहा गया है ॥२०॥ मांस लाख और लवण इन के बेचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित होजाता है दूध के बेचने से तीन दिन में शूद्र तुल्य होजाता है ॥२१॥ व्रतों के न करने वाले और बिना पढ़े ब्राह्मण जिस ग्राम में निवास करते हुए भिक्षा मांगते हैं उस ग्राम के लोगों को राजा वह दण्ड दे जो चोरी की वस्तु के भोगने वाले को होता है ॥ २२ ॥ जिस देशों में विद्वानों के भोगने योग्य पदार्थों को मूर्ख भोगते हैं वे

( १९ ) यदि राजदण्ड का भय न होता तो अब तक पाखाना कमाने के लिये एक भी भंगी न मिलता। क्योंकि मिहतरों को यदि अपने से उत्तम काम मिल सके तो वे कदापि अपने अतिनिकृष्ट काम को नहीं करेंगे ( २० ) दान लेना वेदादि का पढ़ाना यज्ञ कराना ये ख़ास ब्राह्मण के ही काम हैं अन्यके लिये निषेध है ( २३ ) विद्वानों को उत्तम भोग मिलने से विद्या का आदर है विपरीत करने से अविद्या का आदर होता इस लिये अनावृष्टि आदि अनिष्ट फल कहते हैं ॥

६ भाषार्थसहिता-

तेप्यनावृष्टिमिच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् ॥२३॥
ब्राह्मणान्वेदविदुषः सर्वशास्त्रविशारदान् ।
तत्रवर्षतिपर्जन्यो यत्रैतान्पूजयेन्नृपः ॥२४॥
त्रयोलोकास्त्रयोवेदा आश्रमाश्चत्रयोऽग्नयः ।
एतेषांरक्षणार्थाय संसृष्टाब्राह्मणाःपुरा ॥२५॥
उभेसंध्येसमाधाय मौनंकुर्वन्तियेद्विजाः ।
दिव्यवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥२६॥
यएवंकुरुतेराजा गुणदोषपरीक्षणम् ।
यशःस्वर्गनृपत्वंच पुनःकोशंसअर्जयेत् ॥२७॥
दुष्टस्यदण्डःसुजनस्यपूजा न्यायेनकोशस्यचसंप्रवृद्धिः ।
अपक्षपातोर्थिषुराष्ट्ररक्षा पंचैवयज्ञाःकथितानृपाणाम् ॥२८॥


देश भी वृष्टि के अभाव की इच्छा करते हैं अथवा उन में महान् भय उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥

भा०-साङ्गोपाङ्ग वेद को जानने वाले और संपूर्ण शास्त्रों में कुशल ब्राह्मणों की पूजा जिस देश में राजा करता है वहां मेघ ठीक २ वर्षता है ॥ २४ ॥ तीनों लोक तीनों वेद आश्रम और तीनों अग्नि इन की रक्षा के लिये सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण रचे गये हैं ॥ २५॥ जो दोनों सन्ध्याओं के समय एकाग्रचित्त होके मौन हुए जप करते हैं वे द्विज देवताओं के हजार वर्ष तक स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ जो राजा इस प्रकार गुण दोष की परीक्षा करता है वह यश स्वर्ग, राज्य और कोश का ( क्षीण वा नष्ट होने पर भी ) फिर संचय करता है ॥ २७ ॥ ये पांच यज्ञ राजाओं के लिये कहे हैं कि दुष्ट को दण्ड-श्रेष्ठ जन की पूजा, न्याय से कोश का बढ़ाना-मांगने वालों के लिये पक्षपात का न करना. और अपने देश की रक्षा ॥ २८ ॥

( २४ ) विद्वान् ब्राह्मणों का ठीक आदर से सत्कार किया जाय तो वे लोग अग्निहोत्रादि वेदोक्त कर्म ठीक २ करें जिस से देवता लोग प्रसन्न होकर ठीक २ समय पर वर्षा करें इसी रीति से त्रिलोकी की रक्षादि हो सकती है ॥