भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसहिता ॥ २३

द्विजैस्तदानुगन्तव्या एषधर्मःसनातनः ॥ ५७ ॥
तस्माद्द्विजोमृतंशूद्रं नस्पृशेन्नचदाहयेत् ।
दृष्टेसूर्यावलोकेन शुद्धिरेषापुरातनी ॥ ५८ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे तृतीयोध्यायः ॥

अतिमानादतिक्रोधात्स्नेहाद्वायदिवाभयात् ।
उद्वध्नीयात्स्त्रीपुमान्वा गतिरेषाविधीयते ॥ १ ॥
पूयशोणितसंपूर्णे त्वन्धेतमसिमज्जति ।
षष्टिवर्षसहस्राणि नरकंप्रतिपद्यते ॥ २ ॥
नाशौचंनोदकंनाग्निं नाश्रुपातंचकारयेत् ।
वोढारोऽग्निप्रदातारः पाशच्छेदकरास्तथा ॥ ३ ॥
तप्तकृच्छ्रेणशुद्ध्यन्तीत्येवमाहप्रजापतिः ।
गोभिर्हतंतथोद्वद्धं ब्राह्मणेनतुघातितम् ॥ ४ ॥
संस्पृशन्तितुयेविप्रा वोढारश्चाग्निदाश्चये ।


सीप जांय यही सनातन धर्म की रीति है ॥ ५७ ॥ तिस से द्विज लोग मरे हुए शूद्र का न तो स्पर्श करें और न दाह करावें यदि मरे शूद्र को देख ले तो सूर्यनारायण के दर्शन से शुद्धि होती है यह शुद्धि पुरातन धर्म की मर्यादा है ॥५८॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र का तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥

अत्यन्त मान से वा अत्यन्त क्रोध से या किसी के साथ अधिक प्रेम होने से वा भय से स्त्री अथवा पुरुष परस्पर फांसी दें तो उन की निम्न लिखित गति होती है ॥ १ ॥ पीव और रुधिर से भरे नरक में साठ हजार वर्ष तक गोता खाते हैं ॥ २ ॥ न उन का अशौच, न जलदान, न अग्निदाह, और न आंसू वहाते हुये उन के लिये कोई रोवे जो उन्हें गंगा आदि में ले जांय वा जो अग्नि में दाह करे और जो उन की फांसी को काटे ॥ ३ ॥ वे लोग तप्त कृच्छ्र व्रत करने से शुद्ध होते हैं ऐसा प्रजापति ने कहा है-जो पुरुष गौओं से मारा गया हो वा बन्धन (फांसी) से मरा हो वा जिस को ब्राह्मण ने मारा हो ॥४॥ उसका जो ब्राह्मण स्पर्श करें वा उसके मृत देहको श्मशान में लेजांय वा जो