अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाथंसहिता ॥ २५
कुर्याच्चान्द्रायणंपष्ठे सप्तमेत्वैन्दवद्वयम् ॥ १२ ॥ शुद्ध्यर्थमष्टमेचैव षण्मासान्कृच्छ्रमाचरेत् । पक्षसंख्याप्रमाणेण सुवर्णान्यपिदक्षिणा ॥ १३ ॥ ऋतुस्नानातुयानारी भर्त्तारंनोपसर्पति । सामृतानरकंयाति विधवाचपुनःपुनः ॥ १४ ॥ ऋतुस्नातांतुयोभार्या सन्निधौनोपगच्छति । घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यतेनात्रसंशयः ॥ १५ ॥ अदुष्टापतितांभार्थी यौवनेयःपरित्यजेत् । सप्तजन्मभवेत्स्त्रीत्वं वैधव्यंचपुनःपुनः ॥ १६ ॥ दरिद्रंव्याधितंमूर्खं भर्त्तारंयावमन्यते । सामृताजायतेव्याली वैधव्यंचपुनःपुनः ॥ १७ ॥ पत्यौजीवतियानारी उपोष्यव्रतमाचरेत् । आयुष्यंहरतेभर्तुः सानारीनरकंव्रजेत् ॥ १८ ॥
दो महीने के संग में चान्द्रायण और चार महीने के संग में दो चान्द्रायण व्रत करे ॥१२॥ एक वर्ष के संग में छः महीने तक कृच्छ्रव्रत करे और एक पक्ष की संख्या के प्रमाण से सुवर्ण दान की संख्याओं का प्रमाण जानो । अर्थात् एक महिने के संग का प्रायश्चित्त हो तो दो सुवर्ण दक्षिणा देवे (सोलह मासा सोने को 'सुवर्ण' कहते हैं) ॥ १३ ॥ जो स्त्री ऋतु काल में चौथे दिन स्नान करके छठे आदि दिन पति के समीप नहीं जाती वह मर कर नरक में जाती है और बारं बार विधवा होती है ॥ १४ ॥ जो पुरुष ऋतु में स्नान जिसने किया हो उस अपनी पत्नी के समीप नहीं जाता उसे घोर भ्रूण हत्या लगती है ॥ १५ ॥ जो पतित न हुई हो ऐसी निर्दोष पत्नी को युवावस्था में जो पुरुष छोड़ देता है वह सात जन्म तक स्त्री योनि में जन्म लेता और बार २ विधवा होता है ॥ १६ ॥ दरिद्री, रोगी मूर्ख भी जो अपना पति हो उस का जो स्त्री अपमान करती है वह मर कर सांपिन होती और बारं बार विधवा होती है ॥ १७ ॥ पति के जीवते जो स्त्री उपवास तथा व्रत करती है वह अपने पति की अवस्था घटाती और आप नरक में जाती है ॥ १८ ॥