अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥
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दद्यान्मातापितावापि सपुत्रोदत्तकोभवेत् ॥ २५ ॥
परिवित्तिःपरीवेत्ता ययाचपरिविद्यते ।
सर्वेतेनरकंयान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ २६ ॥
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुतेयोऽग्रजेसति ।
परिवेत्तासविज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः ॥ २७ ॥
द्वौकृच्छ्रौपरिवित्तेस्तु कन्यायाःकृच्छ्रएवच ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौदातृस्तु होताचान्द्रायणं चरेत् ॥२८॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिविन्दतः ॥ २६ ॥
पितृव्यपुत्रःसापत्नः परनारीसुतस्तथा ।
दाराग्निहोत्रसंयोगे नदोषःपरिवेदने ॥ ३० ॥
ज्येष्ठोभ्रातायदातिष्ठेदाधानंनैवकारयेत् ।
अनुज्ञातस्तुकुर्वीत शंखस्यवचनंयथा ॥ ३१ ॥
दे देवे वह दत्तक पुत्र होता है ॥ २५ ॥ परिवित्ति ( परिवेत्ता का बड़ा भाई ) परिवेत्ता ( बड़े भाई से पहिले जो छोटा बिवाह करै ) वह कन्या जिस के साथ बिवाह करने से वह परिवेत्ता हुआ है, कन्या का दाता और याजक (विवाह पढ़ने वाला) ये सब नरक में जाते हैं ॥२६॥ ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र ग्रहण करे वह परिवेत्ता और ज्येष्ठ भाई परिवित्ति कहाता है ॥ २७ ॥ परिवित्ति दो कृच्छ्र व्रत करे कन्या एक कृच्छ्र व्रत करे, कन्याका दाता कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करे तथा विवाह कराने वाला पुरोहित चांद्रायण व्रत करै ॥ २८ ॥ कुबड़ा, विलंदिया (बौना) नपुंसक, तोतला, महा मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा, गूंगा, इन ऐसे जेठे भाइयों के परिवेदन करने ( पहिले विवाह वा अग्निहोत्र लेने ) में दोष नहीं है ॥ २९ ॥ यदि जेठा भाई चाचा का पुत्र हो, वा सौतेली माता का पुत्र हो, वा दूसरे की स्त्री का पुत्र हो तो उस से पहिले बिवाह करने और अग्निहोत्र लेने से उस के परिवेदन में दोष नहीं है ॥३०॥ जेठा भाई विद्यमान हो पर स्वयं अग्निहोत्र न ले तब शंख ऋषि के वचनानुसार उस बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई अग्निहोत्र को ग्रहण करले ॥ ३१ ॥