अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ पराशरस्मृतिः ॥
नष्टेमृतेप्रव्रजिते क्लीबेचपतितेपतौ ।
पञ्चस्वापत्सुनारीणां पतिरन्योविधीयते ॥ ३२ ॥
मृतेभर्त्तरियानारी ब्रह्मचर्य्यव्रतेस्थिता ।
सामृतालभतेस्वर्गं यथातेब्रह्मचारिणः ॥ ३३ ॥
तिस्रःकोट्योऽर्द्धकोटीच यानिलोमानिमानवे ।
तावत्कालंवसेत्स्वर्गे भर्त्तारंयाऽनुगच्छति ॥ ३४ ॥
व्यालग्राहीयथाव्यालं बलादुद्धरतेबिलात् ।
एवंस्त्रीपतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ ३५ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
वृकश्वानशृगालादि दष्टोयस्तुद्विजोत्तमः ।
स्नात्वाजपेत्सगायत्रीं पवित्रांवेदमातरम् ॥ १ ॥
गवांशृङ्गोदकस्नानान्महानद्योस्तुसंगमे ।
जिस से सगाई हुई हो वह पति नष्ट ( परदेश में गया हो और खबर न हो ) हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी हो जाय, वा नपुंसक निकले, वा पतित हो जाय, तो इन पांच आपत्तियों में दूसरा पति कहा है अर्थात् सगाई हुये पीछे दूसरे के संग सगाई करके विवाह कर देवे ॥ ३२ ॥
पति के मरे पीछे जो स्त्री ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहती है। वह मर कर स्वर्ग में इस प्रकार जाती है जैसे वे ब्रह्मचारी गये ॥ ३३ ॥ जो स्त्री पति के संग अनुगमन ( सती होना ) करती है वह साढ़े तीन करोड़ मनुष्य के शरीर में जो लोम हैं उतने ही वर्ष तक स्वर्ग में बसती है ॥३४॥ सांप को पकड़ने वाला जैसे बिले में से सांप को निकाल लेता है ऐसे ही वह स्त्री भी नरक से अपने पति का उद्धार करके उस पति के संग ही स्वर्ग में आनन्द भोगती है ॥३५॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ४ चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥
भेड़िया, कुत्ता, गीदड़, आदि जिस ब्राह्मण को काटें वह स्नान करके वेदों की माता पवित्र गायत्री का जप करे ॥ १ ॥ कुत्ता जिसे काटे वह गौ के सींग के जलस्नान से वा गङ्गादि महानदियों के सङ्गम में स्नान करने