भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३० पराशरस्मृतिः ॥

वृषंप्रदक्षिणोकृत्य सद्यःस्नात्वाशुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥
चण्डालेनश्वपाकेन गोभिर्विप्रैर्हतोयदि ।
आहिताग्निर्मृतोविप्रो विषेणात्माहतोयदि ॥ १० ॥
दहेत्तं ब्राह्मणंविप्रो लोकाग्नौमन्त्रवर्जितम् ।
स्पृष्ट्वाचोह्याचदग्ध्वाच सपिण्डेषुचसर्वदा ॥ ११ ॥
प्राजापत्यंचरेत्पश्चाद्विप्राणामनुशासनात् ।
दग्ध्वास्थीनिपुनर्गृह्य क्षीरैःप्रक्षालयेद्द्विजः ॥ १२ ॥
स्वेनाऽग्निनास्वमन्त्रेण पृथगेतन्पुनर्दहेत् ।
आहिताग्निर्द्विजः कश्चित्प्रवसेत्कालचोदितः ॥ १३ ॥
देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याऽग्निर्वसतेगृहे ।
श्रौताग्निहोत्रसंस्कारः श्रूयतांमुनिपुङ्गवाः ! ॥ १४ ॥
कृष्णाजिनंसमास्तीर्य कुशैस्तुपुरुषाकृतिम् ।
षट्शतानिश्शतंचैव पलाशनांचवृन्तकम् ॥ १५ ॥


तो शिव जी के बाहन बैल ( नन्दी ) की प्रदक्षिणा कर शीघ्र स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ९ ॥ यदि किसी ब्राह्मण को चाण्डाल, श्वपाक ( महतर की जाति डोम ) गौ, वा ब्राह्मण, मारडाले वा विष खा कर स्वयं मरजाय और वह आहिताग्नि नाम अग्निहोत्री होय तो ॥ १० ॥ उस ब्राह्मण का लौकिक अग्नि से दाह करे । और यदि सपिण्ड के लोग उस का स्पर्श करें, श्मशान में ले जांय वा दाह करें तो क्रिया करने पश्चात् सदैव ॥ ११ ॥ ब्राह्मणों की आज्ञा से प्राजापत्य व्रत करें और उस के फंके हुये हाड़ों को फिर बीन कर द्विज लोग दूधसे धोवें ॥ १२ ॥ फिर अपने अग्नि और अपनी शाखा के मन्त्र से दूसरी जगह विधिपूर्वक उस चाण्डादि के हाथ से मरे ब्राह्मण के हड्डियों का दाह करें। यदि अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश में काल वश ॥ १३ ॥ मरण को प्राप्त हो जाय और अग्नि उस के घर में विद्यमान होय तो हे मुनियो में श्रेष्ठ लोगो ! उस प्रेत का वेदोक्त अन्त्येष्टि संस्कार तुम सुनो ॥ १४ ॥ कालीमृगछाला बिछाकर कुशाओं से पुरुष का आकार बनावे सातसौ ७०० ढांकके पत्ते डंडी सहित इस निम्न लिखित प्रकार से उसमें लगावे ॥ १५ ॥