भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाऽर्थसहिता ॥ ३१

चत्वारिंशच्छिरेदद्यात्षष्टिंकण्ठेतुविन्यसेत् । बाहुभ्यांचशतंदद्यादङ्गुलीषुदशैवतु ॥ १६ ॥ शतंचोरसिसंदद्याच्छतंचैवोदरेन्यसेत् । दद्यादष्टौवृषणयोःपञ्चमेढूरेतुविन्यसेत् ॥ १७ ॥ एकविंशतिमूरुभ्यां जानुजङ्गेचविंशतिम् । पादाङ्गुल्‍योःशताद्वंच यज्ञपात्रंततोन्यसेत् ॥ १८ ॥ शम्यांशिशनेविनिक्षिप्य अरणिंमुष्कयोरपि । जूहूंचदक्षिणेहस्ते वामेतूपभृतंन्यसेत् ॥ १९ ॥ कर्णेतूलूखलंदद्यात्पृष्ठे चमुसलंन्यसेत् । उरसिंक्षिप्यदृषदं तण्डुलाज्यतिलान्मुखे ॥ २० ॥ श्रोत्रेचप्रोक्षणींदद्यादाज्यस्थालींचचक्षषोः । कर्णनेत्रेमुखेघ्राणे हिरण्यशकलंन्यसेत् ॥ २१ ॥ अग्निहोत्रोपकरणमशेषंतत्रविन्यसेत् । असौस्वर्गायलोकायस्वाहेतिचघृताहुतिम् ॥ २२ ॥


चालीस शिर में, साठ पत्ते कंठ में, दोनों भुजाओं में सौ २ पत्ते, और दश २ (पचास) पत्ते अंगुलियों में लगावे ॥१६॥ सौ पत्ते छाती में, सौ पत्ते उदर में, और आठ पत्ते दोनों वृषणों (अण्डकोशों) में, और पांच मेढ्र (लिङ्ग) में, रक्खे ॥१७॥ इक्कीस २ पत्ते घोंटू से ऊपर दोनों जांघों में, घोंटू से नीचे गोड़ों में बीश २ पत्ते, और पगों की अङ्‌गुलियों में पचाश पत्ते रक्खै । फिर यज्ञ के पात्रों का विनियोग निम्न लिखित रीति से करे ॥१८॥ शम्या नामक यज्ञ पात्र को लिंग पर, अरणी को अंडकोशों पर, दहिने हाथ पर जुहू को, वांयें हाथ में उपभृत् को रक्खै ॥ १९ ॥ दहिने कान पर ऊखल को, पीठ पर मूसल को रक्खै, छाती पर दृषद् (हविषपीषने की शिल) तंडुल, घी, और तिल मुख पर रक्खे ॥ २० ॥ कान पर प्रोक्षणी पात्र, नेत्रों में आज्य स्थाली को रक्खै, कान, नेत्र, मुख, नाक, इन के छिद्रों में सुवर्ण के टुकड़े डाले ॥ २१ ॥ और अग्निहोत्र के शेष बचे सब औजार वहां चितापर रखदे फिर (असौस्वर्गाय लोकाय स्वाहा) इस मंत्र से घृत की एक आहुति छोड़े ॥२२॥