अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ पाराशरस्मृतिः ॥
दद्यात्पुत्रोऽथवाभ्राताप्यन्योवापिचबान्धवः ।
यथादहनसंस्कारस्तथाकार्यंविचक्षणैः ॥ २३ ॥
ईदृशंतुविधिंकुर्याद्ब्रह्मलोकगतिःस्मृता ।
दहन्तियेद्विजास्तंतु तेयान्तिपरमांगतिम् ॥ २४ ॥
अन्यथाकुर्वतेकर्म त्वात्मबुद्धिप्रचोदिताः ।
भवन्त्यल्पायुषस्तेवै पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ २५ ॥
इति पाराशरोये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि प्राणहत्यासुनिष्कृतिम् ।
पराशरेणपूर्वोक्तां मन्वर्थापिचविस्तृताम् ॥ १ ॥
क्रौंचसारसहंसांश्च चक्रवाकंचकुकुटम् ।
जालपादंचशरभं हत्वाऽहोरात्रतःशुचिः ॥ २ ॥
बलाकाटिट्टिभौवापि शुकपारावतावपि ।
अटीनवकघातीचशुद्ध्येतेनक्तभोजनात् ॥ ३ ॥
वृककाककपोतानां सारीतित्तिरिघातकः ।
पुत्र, भाई, अथवा अन्य कोई बांधव इस आहुति को देवे । फिर जैसे अग्नि से दाह करते हैं वैसे ही विद्वान् लोग सब कर्म करें ॥ २३ ॥ जिस मृतक का ऐसे पूर्वोक्त विधान से दाह कर्म किया जाय उस को ब्रह्मलोक प्राप्त होता है और जो ब्राह्मणादि द्विज उस अग्निहोत्री का दाह करते हैं वे भी परमगति को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ जो लोग अपनी बुद्धि से अन्यथा शास्त्र विरुद्ध कर्म करते हैं वे अल्प अवस्था वाले होते हैं और अशुद्ध नरक में पड़ते हैं ॥ २५ ॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूराहुआ ॥
यहां से प्राणियों की हत्याओं का प्रायश्चित्त कहते हैं। जो प्रथममहर्षि पाराशर ने कहा और जिसे मनु जी ने भी विस्तार से कहा है ॥ १ ॥ क्रौंच, सारस, हंस, चकवा, मुरगा, जालपाद, शरभ (एक प्रकार का मृग) इनको मारकर एक दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ बलाका, टिट्टिभ, तोता, कबूतर, अटीनवक (जो वगला उड़ता फिरे) इन के मारने पर दिन भर व्रत कर रात्रि को भोजन करने से शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ भेड़िया, कौआ, कपोत, सारी ( पक्षिभेद ) और