भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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६० | पराशरस्मृतिः ॥

यवसश्चोपहर्त्तव्यो यावद्दृढबलोभवेत् ॥ २० ॥
यावत्संपूर्णासर्वाङ्गस्तावत्तंपोषयेन्नरः ।
गोरूपंब्राह्मणस्याग्रे नमस्कृत्याविसर्जयेत् ॥ २१ ॥
यद्यसंपूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहोभवेत्तदा ।
गोघातकस्यतस्यार्द्धं प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥
काष्ठलोष्टकपाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतोबलात् ।
व्यापादयतियोगांतु तस्यशुद्धिविनिर्दिशेत् ॥ २३ ॥
चरेत्सांतपनंकाष्ठे प्राजापत्यंतुलोष्टके ।
तप्तकृच्छ्रंतुपाषाणे शस्त्रेचैवातिकृच्छ्रकम् ॥ २४ ॥
पञ्चसान्तपनेगावः प्राजापत्येतथात्रयः ।
तप्तकृच्छ्रेभवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रेत्रयोदश ॥ २५ ॥
प्रमापणेप्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् ।
तस्यानुरूपंमूल्यंवा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥ २६ ॥


और जब तक बैल बलवान् हो तब तक घास खिलाया करे काम कुछ न लेवे ॥२०॥

जब तक ठीक घाव पूरा होके रुष्ट पुष्ट हो जाय तब तक मनुष्य उस का पोषण करे । फिर गौ रूप बैल को ब्राह्मण के आगे नमस्कार करके छोड़ देवे ॥ २१ ॥ यदि उस बैल का कोई अंग ठीक अच्छा न हो किन्तु लूता लंगड़ा ही रहे और हीनदेह (दुबला) होजाय तो गौ के मारने वाले को कहे से आधा प्रायश्चित्त बतावे ॥ २२ ॥ लकड़ी, ढेला, पत्थर, वा किसी हथियार से बल पूर्वक मारी हुई गौ मरजाये तो उस का निम्न लिखित प्रायश्चित्त जानो ॥ २३ ॥ लकड़ी से मरने पर कृच्छ्र सान्तपन, ढेला से मरने पर प्राजापत्य, पत्थर से मरने पर तप्तकृच्छ्र, और हथियार (बर्छी भालादि) से मरने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ २४ ॥ सान्तपन में पांच, प्राजापत्य में तीन, तप्त कृच्छ्र में आठ और अतिकृच्छ्र व्रत करने में तेरह गौ दक्षिणा देवे ॥ २५ ॥ प्राणियों के मारने पर उन २ की प्रतिमा सुवर्ण की बनवा के दान करे अथवा उस २ प्राणी का जितना २ उचित मूल्य हो उतना दान करे यह बात मनु जी ने कही है ॥ २६

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