अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 504, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ | शंखस्मृतिः ॥
नर्मदायांगयातीरे सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ २८ ॥ वाराणस्यांकुरुक्षेत्रे भृगुतुङ्गेमहालये । सप्तवेण्यामृषिकूपेच तदप्यक्षयमुच्यते ॥ २९ ॥ म्लेच्छदेशेतथारात्रौ सन्ध्यायांचविशेषतः । नश्राद्धमाचरेत्प्राज्ञो म्लेच्छदेशेनचव्रजेत् ॥ ३० ॥ हस्तिच्छायासुयद्दत्तं यद्दत्तंराहुदर्शने । विषुवत्ययनेचैव सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ ३१ ॥ प्रौष्ठपदामतीतायां मघायुक्तांत्रयोदशीम् । प्राप्यश्राद्धंप्रकर्त्तव्यं मधुनापायसेनवा ॥ ३२ ॥ प्रजांपुष्टिंयशःस्वर्गमारोग्यंचधनंतथा । नृणांश्राद्धैःसदाप्रीताः प्रयच्छन्तिपितामहाः ॥ ३३ ॥ इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ जननेमरणेचैव सपिण्डानांद्विजोत्तम । त्र्यहाच्छुद्धिमवाप्नोति योऽग्निवेदसमन्वितः ॥ १ ॥ सपिण्डतातुपुरुषे सप्तमेविनिवर्त्तते ।
देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ काशी कुरुक्षेत्र, भृगुतुङ्ग, महालय (कन्या-गत ) सप्तवेणी, ऋषि कूप, इन में पिण्ड दान अनन्त फल दायक कहा है ॥२९॥ म्लेच्छों के देश में, रात्रि में और विशेष कर सन्ध्या के समय, बुद्धिमान् मनुष्य श्राद्ध न करे और म्लेच्छ देश में गमन भी न करें ॥ ३० ॥ गजच्छाया ( यह योग पहिले लिख आये हैं ) ग्रहण के समय, - विषुवत्स्रंक्रांति और दोनों अयन इन में कहा है ॥ ३१ ॥ भादों मास की पूर्णिमा बीत जाने पर, मघा नक्षत्र से संयुक्त त्रयोदशी के दिन, मधु महत से व खीर से श्राद्ध करे ॥ ३२ ॥ सन्तान, पुष्टि, यश, स्वर्ग, आरोग्य, धन, इन सब को, प्रसन्न हुये पितर लोग सदैव मनुष्यों को देते हैं ॥ ३३ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में चौदहवा अध्याय पूरा हुआ ॥
सपिण्डों (पांच वा सात पीढ़ी वालों) के जन्म, अथवा मरण में अग्निहोत्री और नियमानुसार वेदाध्यायन कर्त्ता ब्राह्मण, तीन दिन में शुद्ध होता है ।१। सातवीं पीढ़ी में सपिण्डता निवृत्त हो जाती है । और गुण कर्म हीन जाति