भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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४० भाषार्थसहिता ॥

प्रायश्चित्तेनतच्छीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ २२२ ॥
अनुडुत्सहितांगांच दद्याद्विप्रायदक्षिणाम् ।
शरभोष्ट्रहयान्नागान् सिंहशार्दूलगर्दभान् ॥ २२३ ॥
हत्वाचशूद्रहत्यायाः प्रायश्चित्तंविधीयते ।
मार्जारंगोधानकुलं मण्डूकांश्चपतत्रिणः ॥२२४॥
हत्वात्र्यहंपिवेत्क्षीरं कृच्छ्रंव्यापादिकंचरेत् ।
चाण्डालस्यचसंस्पृष्टं विण्मूत्रोच्छिष्टमेववा ॥ २२५॥
त्रिरात्रेणविशुद्धेहि भुक्तोच्छिष्टंसमाचरेत् ।
वापीकूपतडागानां दूषितानांचशोधनम् ॥२२६॥
उद्धरेत्घटशतंपूर्णं पंचगव्येनशुध्यति ।
अस्थिचर्मावसिक्तेषु खरश्वानादिदूषिते ॥ २२७॥
उद्धरेदुदकंसर्वं शोधनंपरिमार्जनम् ।


प्राजापत्यव्रत करे और लोहे के डंड से जो करे वह अतिकृच्छ्रव्रत करे और प्रायश्चित्त करने के अनन्तर ब्राह्मणों को जिमावे ॥२२२॥ और बैल सहित एक गौ ब्राह्मणों को दक्षिणा दे-शरभ नामक मृग, ऊंट-घोड़ा-हाथी-सिंह-शार्दूल-और-गधा॥२२३: इन कीहत्याकरने परशूद्र की हत्याकाजो प्रायश्चित्त है उसे करे बिलाव-गोह-नेवला मेंढक-पक्षी ॥२२४॥ इन को मारकर तीन दिन तक दुग्ध पीवे और मारने में जो कृच्छ्र कहा है उसे करे-चांडाल के स्पर्श किये और विष्ठा तथा मूत्र से छुए हुए उच्छिष्ट को खाकर ॥२२५॥ तीन दिन में विशुद्ध होकर उच्छिष्ट के भक्षण में जो प्रायश्चित्त है उसे करे-अशुद्ध पदार्थ से दुष्टता को प्राप्त हुए बावड़ी कूप और ताल इन का शोधन यह है कि ॥ २२६ ॥ भरे हुए काफी १०० घड़े भर २ जल निकाले फिर पंचगव्य घेरने से शुद्ध होते हैं हड्डी चाम जिनमें पड़गये हों और गधा-कुत्तादि से जोदूषित होगए हों ॥२२७॥ तो उनवापीआदिकासबजल निकाले और स्वच्छकरे--गौको जिस पात्र में दुहते