अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिसमृतिः ॥ ४१
गोदोहनेचर्मपुटेचतोयं यंत्राकरेकारुकंशिल्पहस्ते ॥२२८॥
स्त्रीबालवृद्धाचरितानियान्यप्रत्यक्षदृष्टानिशुचीनितानि ।
प्राकाररोधेविषमप्रदेशे सेवानिवेशेभवनस्यदाहे ॥२२९ ॥
अवास्ययज्ञेषुमहोत्सवेषु तेष्वेवदोषानविकल्पनोयाः ।
प्रपास्वरव्येघटकस्यकूपे द्रोण्यांजलंकोशविनिर्गतंच ॥२३० ॥
श्वपाकचाण्डालपरिग्रहेतु पीत्वाजलं पंचगव्येनशुद्धिः।
रेतोविण्मूत्रसंस्पृष्टं कौपंयदिजलं पिबेत् ॥ २३१ ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्यात् कुंभेसांतपनंतथा ।
त्रिलग्नेभिन्नशवयत्स्या-दज्ञानाच्चतथोदकम् ॥२३२॥
प्रायश्चित्तंचरेत्पीत्वा तप्तकृच्छ्रंद्विजोत्तमः ।
उष्ट्रीक्षीरंखरीक्षीरं मानुषीक्षीरमेवच ॥२३३ ॥
प्रायश्चित्तंचरेत्पीत्वा तप्तकृच्छ्रं द्विजोत्तमः ॥
हो उसका और चाम के पात्र का जो जल है-यंत्र में का, खान का कारीगर और चित्र काढ़ने वाला इन के हाथ का जो जल है ॥२२८॥ स्त्री बालक और वृद्ध इन के आचरित (छुए हुए) जो जल हैं और प्रत्यक्ष देखे न हों वे संपूर्ण शुद्ध हैं परन्तु परकोटा की रोक में विषम (संकट के) देश में सेवा के स्थान में भवन में अग्नि लगने के समय ॥ २२९ ॥ असम्पूर्ण यज्ञ में बड़े उत्सवों में इन में दोषों की शंका नहीं करनी । प्याऊओं में वन में रंहट के कूप में द्रोणी (एक जल का बड़ा पात्र जो कुये के पास रक्खा रहता है) में और कोश (हौद) से निकला जल शुद्ध हैं ॥२३०॥ श्वपाक (जो कुत्ते को खाते हैं) और चाण्डाल इन के घर पर जल पीकर पंचगव्य पीने से शुद्धि होती है वीर्य विष्ठा मूत्र इन का जिस में मेल हो ऐसे कूप के जल को यदि पीले ॥ २३१ ॥ तो तीन दिन में शुद्धि होती है और वीर्य विष्ठा मूत्र जिस में रक्खे गये हों ऐसे घड़े के जल को जो पीवे वह सांतपन व्रत से शुद्ध होता है । शव (मुर्दा) से जो जल मलिन हो जाय अज्ञान से उस जल को ॥ २३२ ॥ पीकर ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करें। ऊंटनी गधी और किसी मनुष्य की स्त्री के दूध को ॥ २३३ ॥ पीकर ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करै यदि
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